सूरह युनुस (10)

सूरह युनुस
“Yunus”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:109 verses
पारा:11

नाम रखने का कारण

इस सूरह का नाम परम्परा के अनुसार केवल चिन्ह के लिए आयत 98 से लिया गया है, जिसमें सांकेतिक रूप से हज़रत यूनुस (अलै) का ज़िक्र हुआ है। सूरह का विषय-शीर्षक हज़रत यूनुस (अलै.) की कथा नहीं है।

अवतरण स्थान

उल्लेखों से मालूम होता है और मूल विषय से इसका समर्थन होता है कि यह पूरी सूरह मक्का में उतरी है।

अवतरणकाल

अवतरणकाल के संबंध में हमें कोई उल्लेख नहीं मिला, किन्तु विषय वस्तु से ऐसा ही प्रकट होता है कि यह सूरह मक्का के निवास काल के अंतिम चरण में अवतरित हुई होगी जब इस्लामी संदेश के विरोधियों की ओर से विरोध पूर्ण रूप धारण कर चुका था।

लेकिन इस सूरह में हिजरत की ओर कोई संकेत नहीं पाया जाता, इसलिए इसका अवतरणकाल उन सूरतों से पहले समझना चाहिए जिनमें कोई-न-कोई सूक्ष्म या असूक्ष्म संकेत हमको हिजरत के संबंध में मिलता है। 

अवतरणकाल के इस निर्धारण के बाद ऐतिहासिक पृष्ठभूमि प्रस्तुत करने की आवश्यकता शेष नहीं रहती, क्योंकि इस काल की, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को सूरह 6 (अनआम) और सूरह 7 (आराफ) के परिचय संबंधी लेखों में वर्णित किया जा चुका है।

विषय वस्तु

अभिभाषण का विषय आमंत्रण, उपदेश और चेतावनी है। वाणी का शुभारंभ इस तरह होता है कि लोग एक मनुष्य द्वारा नुबूवत का संदेश पेश करने पर आश्चर्यचकित हैं और उसे अकारण जादूगरी का इल्जाम दे रहे हैं, यद्यपि वह जो बात पेश कर रहा है इसमें न तो कोई चीज़ आश्चर्यजनक है और न जादू और काहिनी से उसका कोई संबंध है।

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वह तो दो महत्त्वपूर्ण सच्चाइयों से तुमको अवगत करा रहा है, (एक तो एकेश्वरवाद दूसरे कयामत और बदला दिए जाने के दिन का आना।)

ये दोनों सच्चाइयाँ जो वह तुम्हारे सामने प्रस्तुत कर रहा है, अपनी जगह स्वयं सिद्ध तथ्य हैं चाहे तुम मानो या न मानो। इन्हें अगर मान लोगे तो तुम्हारा अपना परिणाम अच्छा होगा, अन्यथा स्वयं ही बुरा परिणाम देखोगे।

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