सूरह आराफ (7)

सूरह आराफ
“Al-A’raf”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:206 verses
पारा:8-9

नाम रखने का कारण

इस सूरह का नाम अल्-आराफ इसलिए रखा गया कि इस सूरह की आयत 48 में, असहाबुल  आराफ (आराफ़ वालों), का उल्लेख हुआ है। इसे सूरह  आराफ कहने का मतलब यह है कि वह सूरह  जिसमें आराफ वालों का उल्लेख है।

अवतरणकाल

इसके विषय वस्तुओं पर विचार करने से स्पष्टतः महसूस होता है कि इसका अवतरण काल लगभग वही है जो सूरह  6 (अनआम) का है। अतः इसके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को समझने के लिए उस प्राक्कथन पर एक दृष्टि डाल लेना काफी होगा जिसे हमने सूरह 6 (अनआम में लिखा है)।

वार्ताएँ 

इस सूरह  के अभिभाषण का केंद्रीय  विषय रिसालत की ओर आमंत्रित करना है। सारी वार्ता का अभिप्राय यह है कि संम्बोधित लोगों को ईश्वर के भेजे हुए पैगम्बर का अनुसरण ग्रहण करने पर तत्पर किया जाए

लेकिन इस आमंत्रण में डराने और चेतावनी का रंग अधिक स्पष्ट रूप से पाया जाता है। क्योंकि जिन लोगों से संबोधन है अर्थात मक्का वाले, उन्हें समझाते-समझाते एक दीर्घ समय व्यतीत हो चुका है और उनका बहरापन, हठधर्मिता और विरोधात्मक आग्रह इस हद तक पहुंच चुका है कि जल्द ही पैग़म्बर को उनसे संबोधन बंद करके दूसरों की ओर रुख करने का आदेश मिलने वाला है।

इसलिए समझाने-बुझाने की शैली में रिसालत (पैग़म्बरी) को स्वीकार करने का आमंत्रण देने के साथ उनको यह भी बताया जा रहा है कि जो नीति तुमने अपने पैग़म्बर के मुकाबले में अपना रखी है ऐसी ही नीति तुमसे पहले की कौमें अपने पैग़म्बरों के मुकाबले में अपना कर बहुत बुरा परिणाम देख चुकी हैं।

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फिर क्योंकि उन पर हुज्जत (तर्कयुक्त वाता) करीब आ चुकी है इसलिए अभिभाषण के अंतिम भाग में आमंत्रण का रुख उनसे हटकर किताब वालों की तरफ फिर गया है। और एक जगह तमाम दुनिया के लोगों को संम्बोधित भी किया गया है, इस बात का इशारा है कि अब हिजरत (स्थान बदलने) का समय क़रीब आ गया है और वह समय जिसमें नबी का संम्बोधन अपने निकट के लोगों से हुआ करता है समाप्त होने को है।

परिचय

सूरह के अंत में नबी (सल्ल.) और आपके सहाबा (सहचर ) को सत्य-प्रचार की विधि के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण आदेश दिए गए हैं और विशेष रूप से उन्हें नसीहत की गई है कि विरोधियों की उत्तेजक बातों और प्रबलताओं के मुकाबले में धैर्य और संयम से काम लें और आवेग में बहकर कोई ऐसा कदम न उठाएं जो वास्तविक उद्देश्य को हानि पहुंचाने वाला हो ।

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