सूरह अन्आम (6)

सूरह अन्आम
“Al-An’am”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:165 verses
पारा:7-8

नाम रखने का कारण

इस सूरह की आयत 139 से 141 तक और 146 से 147 तक की आयतों में कुछ मवेशियों के हराम होने और कुछ के हलाल होने के सम्बन्ध में अरब वालों के अंध विश्वासों का खंडन किया गया है। इसलिए इसका नाम अल-अन्आम (मवेशी) रखा गया है।

अवतरणकाल

इब्ने अब्बास (रजि.) से उल्लिखित है कि यह पूरी सूरह एक ही वक्त में मक्का में अवतरित हुई थी। हज़रत मआज़ बिन जबल (रजि.) की चचेरी बहन असमा बिन्त यजीद (रजि.) कहती है कि “जब यह सूरह नबी (सल्ल.) पर उतरी उस समय आप ऊँटनी पर सवार थे। मैं उसकी नकेल पकड़े हुए थी। बोझ के मारे ऊँटनी का यह हाल हो रहा था कि मालूम होता था कि उसकी हड्डियाँ अब टूट जाएँगी।” उल्लेखों से यह स्पष्ट होता है कि जिस रात यह सूरह अवतरित हुई उसी रात आपने इसे लिपिबद्ध करा दिया।

अवतरण की पृष्ठभूमि

जिस समय यह अभिभाषण दिया गया है उस समय अल्लाह के रसूल द्वारा लोगों को इस्लाम की ओर बुलाते हुए 12 वर्ष व्यतीत हो चुके थे। कुरैश की ओर से रुकावटें और अत्याचार और उनकी हिंसा की नीति शिखर तक पहुँच चुकी थी। इस्लाम कबूल करने वालों की एक बड़ी संख्या उनके जुल्म से विवश होकर देश छोड़ चुकी थी और हबशा में जा बसी थी।

इन परिस्थितियों में यह अभिभाषण दिया गया। इसकी विषय-वस्तुओं को सात बड़े-बड़े शीर्षकों में विभक्त किया जा सकता है:

(1) बहुदेववाद का खण्डन और एकेश्वरवाद की धारणा की ओर लोगों को आमंत्रित करना।

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(2) आखिरत (परलोक) की धारणा का प्रचार-प्रसार करना।

(3) अज्ञान काल के अंधविश्वासों का खण्डन। 

(4) उन उच्च नैतिक सिद्धांतों की शिक्षा जिनके आधार पर इस्लाम समाज का निर्माण चाहता था।

(5) नबी (सल्ल.) और आपके संदेश के विरुद्ध आक्षेपों का उत्तर।

(6) नबी (सल्ल.) और आम मुसलमानों को सांत्वना। 

(7) इनकार करने वालों और विरोधियों को नसीहत, चेतावनी और डरावा।

सूरह अन्आम हिंदी में 

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