सूरह ताहा (20)

सूरह ताहा
“Surah Ta-Ha”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:135 verses
पारा:16

नाम रखने का कारण

पहली आयत में शब्द ता. हा. आया है इसी को लक्षण के रूप में इस सूरह का नाम दे दिया गया है।

अवतरणकाल

इस सूरह का अवतरण काल सूरह मरयम के अवतरणकाल के निकट ही का है। सम्भव है यह हब्शा की हिजरत के समय या उसके पश्चात् अवतरित हुई हो।

जो भी हो यह विश्वस्त है कि हज़रत उमर (रजि.) के इस्लाम स्वीकार करने से पहले यह सूरह अवतरित हो चुकी थी, (क्योंकि अपनी बहन फातिमा बिन्ते खत्ताब रजि.) के घर पर यही सूरह पढ़कर वे मुसलमान हुए थे।) और यह हब्शा की हिजरत से थोड़े समय के बाद ही की घटना है।

विषय और वार्ता

सूरह का आरम्भ इस तरह होता है कि “ऐ मुहम्मद यह कुरआन तुम पर इसलिए नहीं उतारा गया है कि अकारण बैठे-बिठाए तुमको एक संकट में डाल दिया जाए। तुमसे यह अपेक्षित नहीं है कि हठधर्मी लोगों के दिलों में ईमान पैदा करके दिखाओ। यह तो बस एक नसीहत और याददिहानी है ताकि जिसके दिल में ईश्वर का भय हो वह सुनकर सीधा हो जाए।”

इस भूमिका के पश्चात् सहसा हज़रत मूसा (अलै.) का किस्सा छेड़ दिया गया है। जिस वातावरण में यह किस्सा सुनाया गया है, उसकी परिस्थितियों से मिल-जुलकर, यह मक्कावालों से कुछ और बातें करता दिखाई देता है, जो उसके शब्दों से नहीं बल्कि उसकी पंक्तियों के मध्य से व्यक्त हो रही है।

उन बातों को स्पष्ट करने से पहले यह बात अच्छी तरह समझ लीजिए कि अरब में बड़ी संख्या में यहूदियों की मौजूदगी और अरबवालों पर यहूदियों के ज्ञान और विवेक की उच्चता के कारण, तथा रोम और हबशा के ईसाई राज्यों के प्रभाव से भी अरबों में साधारणतः हज़रत मूसा (अलै.) को अल्लाह का पैग़म्बर स्वीकार किया जाता था।

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इस तथ्य को दृष्टि में रखने के बाद अब देखिए कि वे बातें क्या हैं जो इस किस्से की पंक्तियों के मध्य से मक्कावालों पर ज़ाहिर की गई हैं :

(1) अल्लाह किसी को पैगम्बरी (किसी सामान्य अभिघोषणा के साथ) प्रदान नहीं किया करता। पैग़म्बरी तो जिसको भी दी गई है कुछ इसी तरह रहस्यात्मक ढंग से दी गई है, जैसे हज़रत मूसा (अलै.) को दी गई थी, अब तुम्हें क्यों इस बात पर आश्चर्य है कि मुहम्मद (सल्ल.) सहसा नबी बनकर तुम्हारे सामने आ गए।

(2) जो बात आज मुहम्मद (सल्ल.) पेश कर रहे हैं (अर्थात् एकेश्वरवाद और परलोकवाद) ठीक वही बात नुबूवत के पद पर नियुक्त करते समय अल्लाह ने मूसा (अल.) को सिखाई थी।

(3) फिर जिस तरह आज मुहम्मद (सल्ल.) को बिना किसी साज-सामान और सेना के अकेला कुरैश के मुकाबले में सत्य के आह्वान का ध्वजवाहक बनाकर खड़ा कर दिया गया है, ठीक इसी तरह मूसा (अलै.) भी अचानक इतने बड़े काम पर नियुक्त कर दिए गए थे कि जाकर फिरऔन जैसे दमनकारी सम्राट को सरकशी से बाज़ आने का उपदेश दें। कोई सेना उनके साथ भी नहीं भेजी गई थी। 

(4) जो आक्षेप और संदेह और आरोप और चाल और अत्याचार के हथकण्डे मक्कावाले आज मुहम्मद (सल्ल.) के मुकाबले में इस्तेमाल कर रहे हैं, उनसे बढ़चढ़कर यही सब हथियार फिरऔन ने मूसा (अलै.) के मुकाबले में इस्तेमाल किए थे।

फिर देख लो कि किस तरह वह अपने सभी उपायों में असफल हुआ और अन्ततः कौन प्रभावी रहा। इस सम्बन्ध में स्वयं मुसलमानों को भी एक निश्शब्द सान्त्वना दी गई है कि अपनी बे-साजो-समानी (के बावजूद तुम ही प्रभावी रहोगे) इसी के साथ मुसलमानों के समक्ष मिस्र के जादूगरों का आदर्श भी प्रस्तुत किया गया है कि जब सत्य उन पर प्रकट हो गया तो वे बेधड़क उस पर ईमान ले आए और फिरऔन के प्रतिशोध का भय उन्हें बाल बराबर भी ईमान की राह से न हटा सका।

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