सूरह हुद (11)

सूरह हुद
“Surah Hud”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:123 verses
पारा:11-12

नाम रखने का कारण

आयत 50 में पैग़म्बर हज़रत हूद (अलै.) का उल्लेख हुआ है, उसी को लक्षण के तौर पर इस सूरह का नाम दे दिया है।

अवतरणकाल

इस सूरह की विषय वस्तु पर विचार करने पर ऐसा लगता है कि यह उसी कालखण्ड में अवतरित हुई होगी जिसमें सूरह 10 (यूनुस) अवतरित हुई। असम्भव नहीं कि यह उसके साथ ही अवतरित हुई हो, क्योंकि अभिभाषण का विषय वही है, किन्तु चेतावनी का ढंग उससे ज़्यादा सख्त है।

हदीस में आता है कि हजरत अबू बक्र (रजि.) ने नबी (सल्ल.) से कहा, “मैं देखता हूँ कि आप बूढ़े होते जा रहे हैं, इसका क्या कारण है?” उत्तर में नबी (सल्ल.) ने कहा, “मुझे सूरह 11 (हूद) और उसके समान विषय वाली सूरतों ने बूढ़ा कर दिया है।”

इससे अंदाज़ा होता है कि नबी (सल्ल.) के लिए वह समय कितना कठिन होगा, जबकि कुरैश के अधर्मी समस्त हथियारों से सत्य के आह्वान को कुचल देने की कोशिश कर रहे थे और दूसरी ओर अल्लाह की ओर से चेतावनियाँ अवतरित हो रही थीं।

उन परिस्थितियों में आपको हर समय यह आशंका घुलाए देती होगी कि कहीं अल्लाह की दी हुई मोहलत समाप्त न हो जाए और वह अंतिम घडी न आ जाए जब अल्लाह किसी जाति को यातना में पकड़ लेने का निर्णय कर लेता है।

वास्तव में इस सूरह को पढ़ते हुए ऐसा लगता है, जैसे एक बांध टूटने को है और उस गाफिल आबादी को, जो इस जलप्लावन की चपेट में आने वाली है, यह अंतिम चेतावनी दी जा रही है।

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विषय एवं वार्ताएँ

अभिभाषण का विषय, जैसा कि बयान किया जा चुका है, वही है जो सूरह 10 (यूनुस) का था अथात् आमंत्रण, हितोपदेश और चेतावनी। लेकिन अंतर यह है कि सूरह 10 (यूनुस) की अपेक्षा यहीं आमंत्रण संक्षिप्त है, हित कथन में तर्क कम और उपदेश और शिक्षा अधिक है, और चेतावनी विस्तृत और ज़ोरदार है।

आमंत्रण यह कि पैगम्बर (सल्ल.) की बात मानो, बहुदेववाद को त्याग दो, सबकी बन्दगी छोड़ कर अल्लाह के बंदे और अपने सांसारिक जीवन की सारी व्यवस्था परलोक के उत्तरदायित्व के एहसास पर स्थापित करो।

हित कथन यह है कि सांसारिक जीवन के वाह्य पक्ष पर भरोसा करके जिन जातियों ने अल्लाह के रसूलों के संदेश को ठुकराया है, वे इससे पहले अत्यन्त बुरा परिणाम देख चुके हैं, अब क्या जरूरी है कि तुम भी उसी राह पर चलो, जिसे इतिहास के सतत् अनुभव निश्चित रूप से विनाश की राह सिद्ध कर चुके हैं।

चेतावनी यह है कि यातना आने में जो विलंब हो रहा है यह वास्तव में एक मोहलत है, जो अल्लाह अपनी कृपा से तुम्हें प्रदान कर रहा है। इस मोहलत के मध्य अगर तुम न संभले तो वह यातना आएगी जो किसी से टाले न टलेगी और ईमान वालों के मुट्ठी भर गिरोह को छोड़ कर तुम्हारी सम्पूर्ण जाति के अस्तिल को बिल्कुल मिटा देगी।

इस विषय की अभिव्यक्ति के लिए प्रत्यक्ष संबोधन की अपेक्षा नूह की जाति, आद, समूद और लूत की जाति, मद्यनवाले और फिरऔन की जाति के वृत्तांतों से अधिक काम लिया गया है।

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