Sadqa-e-Fitr (सदका-ए-फित्र) किसे कहते हैं और कितना Fitra देना चाहिए ?

सदका-ए-फ़ित्र का बयान

फित्र का मतलब रोज़ा खोलने या रोज़ा न रखने से हैं। खुदा तआला ने अपने बन्दों पर एक सदका मुकर्रर फ़रमाया है जिसे  रमज़ान शरीफ के ख़त्म होने पर रोज़ा खुल जाने कीं ख़ुशी और शुक्रिया के तौर पर अदा करना होता है ।

ये सदक़ा, सदका-ए-फित्र कहलाता हैं इसे आम ज़बान में Fitra (फ़ितरा) भी कहते है। 

इसी रोज़ा खुलने की खुशी मनाने का दिन होने की वजह से रमज़ान शरीफ के बाद वाली ईद को ईदुल-फित्र कहते हैं।

Fitra Kya Hai Aur Kitna Dena Hai

फ़ितरा किस आदमी पर वाजिब होता है?

हर आजाद मुसलमान पर जबकि वह निसाब (न्यूनतम राशि है जो ज़कात देने के लिए बाध्य होने से पहले एक मुसलमान के पास होनी चाहिए) के बराबर माल का मालिक हो, फ़ितरा वाजिब है।

Fitra वाजिब होने के लिये जो निसाब शर्त है वह वही ज़कात का निसाब है जो बयान हो चुका या कुछ फर्क है?

जकात के निसाब और सदका-फित्र के निसाब की मिकदार तो एक ही है जैसे चौवन ( 54 ) तोला दो (2) माशा चांदी या उसकी कीमत, लेकिन जकात के निसाब और सदका-फित्र के निसाब में यह फर्क है कि जकात फ़र्ज होने के लिए जो चांदी या सोना या तिजारत का माल होना जरूरी है और सदका-फित्र वाजिब होने के लिये इन तीनों चीजों की ख़ुसूसियत नहीं, बल्कि उसके निसाब में हर किस्म का माल हिसाब में ले लिया जाता है। हाँ-असली जरूरत से ज़्यादा और कर्ज से बचा हुआ होना दोनों निसाबों-में शर्त है।

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अगर किसी आदमी के पास उसके इस्तेमाल के कपड़ों से ज़्यादा कपड़े रखे हुए हों या रोज़ाना की जरूरत से ज़्यादा तांबे, पीतल, चीनी वगैरह, के बर्तन रखे हों या कोई मकान उसका खाली पड़ा है और किसी किस्म का सामान और असबाब है और उसकी असली जुरूरत से ज़्यादा है और उन चीजों की कीमत निसाब के बराबर या ज़्यादा है तो उस पर ज़कात फर्ज नहीं, लेकिन सदका-फित्र वाजिब है।

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सदका-फित्र के निसाब पर साल गुजरना भी शर्त नहीं,बल्कि उसी दिन निसाब का मालिक हुआ हो तो भी स दका-फित्र अदा करना वाजिब है।

जिन लोगों को जकात देना जाइज है उन्हें सदका-ए-फित्र भी देना जाइज है और जिन लोगों को जकात देना नाजाइज है उन्हें सदका-ए-फिल्र देना भी नाजाइज है।

सदका-ए-फित्र किस-किस की तरफ से देना वाजिब है? 

हर निसाब के मालिक पर अपनी तरफ़ से और अपनी नाबालिग औलाद की तरफ़ से सदका-फित्र देना वाजिब है। लेकिन नाबालिगों का अगर अपना माल हो तो उनके माल में से अदा करो। 

मशहूर है कि जिसने रोज़े नहीं रखे उस पर सदका-ए-फित्र वाजिब नहीं, यह सही है या गलत ? गलत है, बल्कि हर निसाब के मालिक पर वाजिब है। चाहे रोजे रखे हों या ना रखे हों।

फितरे में क्या-क्या चीज और कितना देना वाजिब है?

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फितरे में हर किस्म का अनाज और कीमत देना जाइज़ है।

इसकी तफ्सील यह है कि अगर गेहूँ या उसका आटा या सत्तू दे तो एक आदमी को पौने दो सेर देना चाहिये। (सेर से मुराद अंग्रेज़ी रूपये से अस्सी ( 80 ) रूपये का वजन है।

जौ या उसका आटा या सत्तू दें तो साढ़े तीन सेर देना चाहिये और अगर जौ और गेहूँ के अलावा और कोई अनाज जैसे चावल, बाजरा, ज्वार वगैरह दें तो पौने दो सेर गेहूँ की कीमत या साढ़े तीन सेर जौ की कीमत में जितना वह अनाज आता हो उतना देना चाहिये ।

फितरे में कीमत दें तो पौने दो सेर गेहूँ या साढ़े तीन सेर जौ की कीमत देनी चाहिये।

सदका-ए-फित्र अदा करने का ज्यादा अच्छा वक्त क्या है?

ईद के दिन ईद की नमाज को जाने से पहले अदा करना ज़्यादा अच्छा है। और नमाज के बाद करे तो यह भी जाइज है और जब तक अदा न करे उसके जिम्मे अदा करना वाजिब रहेगा। चाहे कितनी ही मुद्दत गुजर जाये।

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जिन लोगों पर सदका-ए-फिल्र वाजिब है वे जकात या फ़ितरा ले सकते हैं या नहीं?

नहीं ले सकते और कोई फ़र्ज़ या वाजिब सदका ऐसे लोगों को लेना जाइज नहीं जिनके पास सदका-ए-फित्र का निसाब मौजूद हो।

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