Zakat (ज़कात) kise kehte hain – इस्लाम में गरीबों का अधिकार

ज़कात एक इबादत है। इबादत एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ अल्लाह की उपासना और उसका आज्ञापालन है। मुसलमान अल्लाह को खुश करने और उसका पुरस्कार पाने के लिए ज़कात अदा करते हैं।

अपनी सम्पत्ति में से ज़कात अदा करना, गरीबों की भलाई के लिए अपनी सम्पत्ति में उनको भागीदार बनाना है। यह दान या टैक्स या अनुदान नहीं और यह कोई दयालुता प्रदर्शन करने का साधन भी नहीं है। ज़कात में यह सब अर्थ सम्मिलित हैं लेकिन इसका अर्थ इससे भी अधिक है।

यह केवल अपनी आय या अपनी सम्पत्ति में से कुछ प्रतिशत निकालना ही नहीं है बल्कि यह अपार वृद्धि का साधन और आध्यात्मिक निवेश है।

Zakat एक कर्त्तव्य है जिसका आदेश अल्लाह ने दिया है और मुसलमान इसे पूरे समाज के हित में अदा करते हैं। यह धनवान लोगों की सम्पत्ति पर गरीबों का अधिकार है।

“सदके तो बस गरीबों, मुहताजों और उन लोगों के लिए हैं, ……..  यह अल्लाह की ओर से ठहराया हुया हुक्म है।”

(कुरआन, 9:60)

ज़कात का शाब्दिक अर्थ “शुद्धिकरण” करना है। इस शब्द का तकनीकी अर्थ यह है कि एक मुसलमान अपनी वार्षिक आय का एक निर्धारित हिस्सा जरूरतमंद लाभार्थियों में बाँटता है।

कैलकुलेटर

लेकिन ज़कात का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व इससे अधिक गहरा और अधिक जीवन्त है। इस प्रकार इसका महत्व मानवीय, सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक भी है।

इस्लाम का एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त यह है कि सभी वस्तुएँ अल्लाह की हैं। मुसलमानों को आदेश दिया गया है कि वह दौलत कमाएँ और इसे उस तरीके से खर्च करें जो अल्लाह के लिए स्वीकार्य है। अल्लाह द्वारा आदेशित ज़कात की व्यवस्था उसके साम्राज्य के अन्दर सत्ता में अल्लाह का अधिकार है।

माल के उस ख़ास हिस्से को ज़कात कहते हैं जिसको ख़ुदा के हुक्म के मुवाफ़िक फ़कीरों, मुहताजों वगैरह को देकर उन्हें मालिक बना दिया जाये, यूँ समझो कि नमाज़ रोज़ा बदनी इबादत है और ज़कात माली इबादत है। ज़कात इस्लाम के 5 मूल स्तंभ में से एक है।

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ज़कात (Zakat) का अर्थ और व्यापक प्रभाव

ज़कात का शाब्दिक और साहित्यिक अर्थ शुद्धिकरण और उन्नति है। इस शब्द का तकनीकी अर्थ वह धनराशि है जो करेन्सी (मुद्रा) या सामान के रूप में एक मुसलमान को जरूरतमंद लोगों के बीच बॉँटना होता है।

नियम

यह एक कर्त्तव्य है जिसका आदेश मुसलमानों को अल्लाह ने दिया है ताकि पूरे समाज का इससे हित हो। लेकिन ज़कात का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व अधिक गहरा और जीवन्त है. इसी तरह इसका मानवीय और सामाजिक राजनैतिक मूल्य है।

निम्न में ज़कात के व्यापक प्रभावों को विस्तारपूर्वक प्रस्तुत किया जा रहा है।

1. ज़कात एक मुसलमान को लालच, स्वार्थ, निम्न इच्छाओं और इस भौतिक संसार के प्रेम से मुक्त कर देता है। अल्लाह तआला फरमाता हैः “और जो अपने मन के लोभ और कृपणता से बचा लिया जाए ऐसे ही लोग सफल हैं।” (कुरआन, 59:9)

2. ज़कात लोगों की सम्पत्ति को शुद्ध कर देता है अर्थात यह उस हिस्से को उस से साफ कर देता है जो अब उसका नहीं है। वह हिस्सा जिसे उसको उन लोगों में बॉट देना चाहिए जो उसके अधिकारी हैं।

जब ज़कात लागू हो जाए तो सम्पत्ति का एक निर्धारित प्रतिशत तुरन्त उसके सच्चे अधिकारियों में बॉट देना चाहिए, क्योंकि उसका स्वामी अब उस प्रतिशत पर नैतिक और वैधानिक अधिकार नहीं रखता।

यदि वह ऐसा नहीं करता तो वह स्पष्ट रूप से एक ऐसी चीज़ अपने पास रोकता है जो उसकी नहीं है। यह नैतिक और आध्यत्मिक, वैधानिक और व्यावसायिक प्रत्येक दृष्टिकोण से एक स्पष्ट भ्रष्टाचार है।

इसकी अर्थ यह है कि यह गैर कानूनी प्रतिशत जो रोक लिया गया है वह सम्पर्ति के पूरे भंडार को अशुद्ध कर देता है और उसे ख़तरे में डाल देता है।

लेंकिन दूसरी तरफ यदि गरीबों के हिस्सों को उनके लाभार्थियों में बॉट दिया जाता है तो सम्पत्ति का बचा हुआ हिस्सा शुद्ध हो जाता है। शुद्ध सम्पत्ति और ईमानदारी से कमायी गई सम्पत्ति, सम्पन्नता और ईमानदाराना लेन-देन की पहली शर्त है।

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3. ज़कात केवल देने वाले की सम्पत्ति को ही पाक नहीं करता, बल्कि देने वाले के दिल को स्वार्थ और सम्पत्ति के लालच से भी पाक करता है।

इसके बदले मे यह लेने वाले के दिल को ईर्ष्या और दुश्मनी, घृणा और असहजता से पाक करता है, और यह उसके दिल में ईष्या और घृणा के बदले सद्र्भाव और देने वाले के लिए गर्मजोशी पैदा करता है।

इसके नतीजे में व्यापक रूप से समाज पाक हो जाएगा और अपने आप को संदेह, दुर्भावना और अविश्वास, भ्रष्टाचार और बिखराव और इस तरह की सभी बुराईयों से मुक्त कर लेगा।

4. ज़कात स्वार्थपूर्ण लालच और सामाजिक बिखराव और विरोधी विचारधाराओं के समाज में घुसने के विरुद्ध आन्तरिक सुरक्षा का एक स्वस्थ साधन है।

यह देने वाले की ओर से सामाजिक दायित्व की भावना को परवान चढ़ाने का एक प्रभावपूर्ण माध्यम है और लेने वाले की ओर से सुरक्षा की भावना और अपनत्व का माध्यम है।

5. ज़कात मनुष्य और समाज के बीच दायित्वपूर्ण मेल-जोल की आध्यात्मिक और मानवीय भावना का स्पष्ट प्रदर्शन है। यह इस हकीकत का गंभीर चित्रण है कि यद्यपि इस्लाम निजी व्यापार को नहीं रोकता और निजी सम्पत्ति की निन्दा नहीं करता लेकिन इसके बावजूद स्वार्थी और लालची पूँजीवाद को सहन नहीं करता।

यह इस्लाम के सामान्य दर्शन की अभिव्यक्ति है जो सन्तुलित और मध्य मार्ग, लेकिन सकारात्मक और प्रभावपूर्ण प्रकिरिया  मनुष्य और समाज के बीच, नागरिक और राज्य के बीच, पूँजीवाद और समाजवाद के बीच, और भौतिकवाद और आध्यात्मवाद के बीच संतुलित मार्ग अपनाता है।

6. इस्लाम एक सम्पूर्ण जीवन व्यवस्था है। इसमें अन्य चीज़ों के साथ-साथ जीवन का आर्थिक पहलू भी सम्मिलित है। इस्लाम के अपने अलग आर्थिक सिद्धान्त हैं।

ज़कात इस्लामी अर्थव्यवस्था के बुनियादी सिद्धान्तों में से एक है जो समाज कल्याण और पूँजी के उपयुक्त बटँवारे पर आधारित है।

ज़कात की अनिवार्य अदायगी के अतिरिक्त मुसलमानों को उभारा गया है कि वह गरीबों और जरूरतमंदों की भलाई के लिए और सामाजिक कल्याण के अन्य उद्देश्यों के लिए अपनी ओर से सहयोग करें। अपनी इच्छा से दिये जाने वाले इस सहयोग को सदक़ा (दान) कहा जाता है।

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7. ज़कात की अदायगी के माध्यम से धनवान लोग अपनी दौलत में गरीबों को साझीदार बनाते हैं और इस प्रकार सम्पत्ति के एक जगह एकत्र होने की प्रक्रिया में अवरोध उत्पन्न होता है और सम्पत्ति का न्यायपूर्ण बटवारा सुनिश्चित होता है।

ज़कात से जुड़े सवाल और उनके जवाब (Zakat QnA)

ज़कात देना फ़र्ज है या वाजिब?

ज़कात देना फ़र्ज है। कुरआन मजीद की आयतों और हुज़ूर रसूल करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की हदीसों से इसका फ़र्ज होना साबित है। जो आदमी ज़कात फर्ज होने का इन्कार करे वह काफिर है।

ज़कात फ़ज़ होने की कितनी शर्ते हैं?

(1) मुसलमान ( 2 ) आजाद (3 ) आकिल (4 ) बालिग होना (5) निसाब का मालिक होना ( 6 ) निसाब का अपनी असली जरूरतों से ज़्यादा और कर्ज से बचा हुआ होना और ( 7 ) मालिक होने के बाद निसाब पर एक साल गुजर जाना, ज़कात फर्ज होने की शर्ते है।
काफ़िर , गुलाम, पागल और नाबालिग के माल में ज़कात फर्ज नहीं।
इसी तरह जिसके पास निसाब से कम माल हो, या माल तो निसाब के बराबर है लेकिन वह कर्जदार भी है, या माल साल भर तक बाकी नहीं रहा, तो इन हालतों में भी ज़कात फर्ज नहीं।

किस किस माल में ज़कात फर्ज है?

चाँदी, सोने, और हर तरह के तिजारत के माल में ज़कात फर्ज है।

ज़कात किन लोगों को देना ज़्यादा अच्छा है?

पहले अपने रिश्तेदारों जैसे भाई, बहन, भतीजे, भतीजियाँ, भानजे, भानजियाँ , चचा, फूफी , ख़ाला, मामू, सास ससुर, दामाद वगैरा में जो जरूरतमन्द और हकदार हों उन्हें देने में बहुत ज़्यादा सवाब है। इनके बाद अपने पड़ोसियों या अपने शहर के लोगों में से जो ज़्यादा जुरूरतमन्द हो उसे देना ज्यादा अच्छा है। फिर जिसे देने में दीन का नफ़ा ज़्यादा हो जैसे दीन की तालीम पाने वाले।

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