सूरह वाकिया (56)

सूरह वाकिया
“Al-Waqi’a”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:96 verses
पारा:27

नाम रखने का कारण

पहली ही आयत के शब्द ‘अल-वाकिआ’ (वह होनेवाली घटना) को इस सूरह का नाम दिया गया है।

अवतरणकाल

हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास (रजि.) ने सूरतों के अवतरण का जो क्रम वर्णित किया हैं, उसमें कहते हैं कि पहले सूरह 20 (ता. हा.) अवतरित हुई, फिर अल- वाकिआ और उसके पश्चात् सूरह 26 (अश शुअरा) यही क्रम इकरमा ने भी बयान किया है (बेहकी, दलाइलुन नुबूवत)

इसकी पुष्टि उस किस्से से भी होती है जो हज़रत उमर (रजि.) के ईमान लाने के विषय में इब्ने हिशाम ने इब्ने इसहाक से उद्धृत किया है। उसमें यह उल्लेख आता है कि जब हज़रत उमर (रज़ि) अपनी बहन के घर में दाखिल हुए तो सूरह 20 (ता. हा.) पढ़ी जा रही थी। और जब उन्होंने कहा था कि अच्छा मुझे वह लिखित पृष्ठ दिखाओ जिसे तुमने छिपा लिया है, तो बहन ने कहा, “आप अपने बहुदेववाद के कारण अपवित्र हैं, और इस लिखित पृष्ठ को केवल शुद्ध व्यक्ति ही हाथ लगा सकता है।”

अतएव हज़रत उमर (रज़ि.) ने उठकर स्नान किया और फिर उस पृष्ठ को लेकर पढ़ा। इससे मालूम हुआ कि उस समय सूरह वाकिआ अवतरित हो चुकी थीं, क्योंकि उसी में आयत “इसे पवित्रों के सिवा कोई छू नहीं सकता” (आयत 79) आई है और यह इतिहास से सिद्ध है कि हज़रत उमर (रजि.) हब्शा की हिजरत के पश्चात् सन् 5 नबवी में ईमान लाए हैं।

विषय और वार्ता

इसका विषय परलोक, एकेश्वरवाद और कुरआन के सम्बन्ध में मक्का के काफिरों के संदेहों का खण्डन है। सबसे अधिक जिस चीज़ को वे अविश्वसनीय ठहराते थे, वह कयामत और आख़िरत थी, उनका कहना यह था कि ये सब काल्पनिक बातें हैं जिसका वास्तविक लोक में घटित होना असम्भव है।

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इसके जवाब में कहा कि जब वह घटना घटित होगी तो उस समय कोई यह झूठ बोलने वाला न होगा कि वह घटित नहीं हुई है, न किसी में यह शक्ति होगी कि उसे आते-आते रोक दे या घटना को असत्य कर दिखाए।

उस वक्त अनिवार्यतः सभी मनुष्य तीन श्रेणियों में विभक्त हो जाएँगे। एक, आगे वाले, दूसरे, सामान्य लोग, तीसरे वे लोग जो आखिरत (परलोक) का इन्कार करते रहे और मरते दम तक इन्कार और बहुदेववाद और बड़े गुनाह पर जमे रहे।

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