सूरह हिज्र (15)

सूरह हिज्र
“Al-Hijr”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:99 verses
पारा:14

नाम रखने का कारण

आयत 80 के वाक्यांश ‘‘हिज्र के लोग भी रसूलों को झुठला चुके हैं,” से उद्धृत है।

अवतरणकाल

विषय-वस्तु और वर्णनशैली से स्पष्टतः परिलक्षित होता है कि इस सूरह का अवतरणकाल सूरह इबराहीम (14) से संसर्ग युक्त है। उसकी पृष्ठभूमि में दो चीज़ें बिल्कुल स्पष्ट दिखाई देती हैं।

एक यह कि सत्य की ओर बुलाते हुए नबी (सल्ल.) को एक दीर्घ समय बीत चुका है और संबोधित लोगों की सतत् हठधर्मी, उपहास, विरोध और अत्याचार अपने चरम को पहुँच चुका है। इसके पश्चात् अब समझाने-बुझाने का अवसर कम और चेतावनी देने और डराने का अवसर ज्यादा है।

दूसरे यह कि अपनी क़ौम के कुफ्र और इन्कार और विरोध के पहाड़ तोड़ते रहने के कारण नबी (सल्ल.) थके जा रहे हैं और दिल टूट जाने की स्थिति से बार-बार आपको सामना करना पड़ रहा है, जिसे देखकर अल्लाह आपको सांत्वना दे रहा है और आपकी हिम्मत बंधा रहा है।

विषय और केंद्रीय विषय-वस्तु यही दो विषय-वार्ताएँ इस सूरह में उल्लिखित हुई हैं। अर्थात् चेतावनी उन लोगों को जो नबी (सल्ल.) के आमंत्रण का इनकार कर रहे थे और आपका मज़ाक उड़ाते और आपके कार्य में तरह-तरह की रुकावटें खड़ी करते थे और सांत्वना और साहस बढ़ाना नबी (सल्ल.) का।

किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि यह सूरह समझाने-बुझाने और उपदेश से रिक्त है। कुरान में कहीं भी अल्लाह ने मात्र चेतावनी या विशुद्ध डाँट- फटकार से काम नहीं लिया है।

सख्त से सख्त धमकियों और भर्त्सनाओं के मध्य भी वह समझाने और उपदेश देने में कमी नहीं करता। अतएव इस सूरह में भी एक ओर एकेश्वरवाद के प्रमाणों की तरफ संक्षिप्त संकेत किए गए हैं और दूसरी तरफ आदम (अलै.) और इब्लीस का वृत्तान्त सुनाकर उपदेश दिये गए हैं।

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