सूरह इब्राहीम (14)

सूरह इब्राहीम
“Surah Ibrahim”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:52 verses
पारा:13

नाम रखने का कारण

आयत 35 के वाक्य ‘‘याद करो वह समय जब इब्राहिम ने दुआ की थी कि पालनहार! इस शहर (मक्का) को शांत नगर बना” से उधृत है। इस नाम का अर्थ ये नहीं है कि इस सूरह में हज़रत इबराहीम (अलै.) की जीवनी बयान हुई है, बल्कि यह अधिकतर सूरतों के नाम की तरह लक्षण के रूप में है। अर्थात वह सूरह जिसमें इबराहीम (अलै.) का उल्लेख हुआ है।

अवतरणकाल

सामान्य वर्णन शैली मक्का के अंतिम कालखण्ड की सूरतों जैसी है। यह सूरह 13 (रअद) से निकट समय ही की अवतरित मालूम होती है। विशेषतः आयत 13 के शब्द “इनकार करने वालों ने अपने रसूलों से कहा कि या तो तुम्हें हमारे पंथ में वापस आना होगा अन्यथा तुम्हें हम अपने देश से निकाल देंगे,” का स्पष्ट संकेत इस और है कि उस समय मक्का में मुसलमानों पर अत्याचार अपने चरम को पहुँच चुका था और मक्का वाले पिछली काफ़िर क़ौमों की तरह अपने यहाँ के ईमान वालों को भू-भाग से निकाल देने पर तुल गए थे।

इसी कारण उनको वह धमकी सुनाई गई जो उनकी-सी नीति अपनाने वाली पिछली क़ौमों को दी गई थी कि “हम ज़ालिमों को विनष्ट करके रहेंगे।” और ईमान वालों को वही तसल्ली दी गई जो उनके पहले के लोगों को दी जाती रही है कि “हम इन ज़ालिमों को समाप्त करने के पश्चात् तुम्हीं को इस भू-भाग में आबाद करेंगे।” इसी तरह आयत 42 से लेकर 52 तक के तेवर भी यही बताते हैं कि यह सूरह मक्का के अन्तिम कालखण्ड से संबंध रखती है।

ये भी पढ़े -   सूरह मायदा (5)

केन्द्रीय विषय और उद्देश्य

जो लोग नबी (सल्ल.) की रिसालत (पैग़म्बरी) को मानने से इन्कार कर रहे थे और आपके आमंत्रण को असफल करने के लिए बुरी से बुरी चालें चल रहे थे, उनके लिए हित शिक्षा और चेतावनी है लेकिन हित-शिक्षा की अपेक्षा इस सूरह में चेतावनी और भर्त्सना, डांट और फटकार का अंदाज अधिक तीव्र है।

इसका कारण यह है कि समझाने-बुझाने का हक़ इससे पहले की सूरतों में भली-भाँति अदा किया जा चुका था और इसपर कुरैश के काफ़िरों की हटधर्मी, शत्रुता, विरोध, दुष्टता और अत्याचार दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही चला जा रहा था।

Leave a Reply