सूरह जारियात (51)

सूरह जारियात
“Adh-Dhaariyaat”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का मदीना
आयतें:286 verses
पारा:

नाम रखने का कारण

पहले ही शब्द ‘वज्ज़रियात’ (कसम है उन हवाओं की जो गर्द उड़ाने वाली हैं), से उद्धृत है। आशय है कि वह सूरह जिसका आरम्भ अज़-ज़ारियात शब्द से होता है।

अवतरणकाल

विषय-वस्तुओं और वर्णन-शैली से साफ मालूम होता है कि यह सूरह भी उसी समय में अवतरित हुई थी जिसमें सूरह 50 काफ अवतरित हुई है।

विषय और वार्ताएँ

इसका बड़ा भाग परलोक के विषय पर है और अन्त में एकेश्वरवाद की ओर बुलाया गया है। इसके साथ लोगों को इस बात पर सचेत किया गया है कि नबियों (अलै.) की बात न मानना और अज्ञानपूर्ण धारणाओं पर आग्रह करना स्वयं उन्हीं जातियों के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ है जिन्होंने यह नीति अपनाई है।

आखिरत के सम्बन्ध में जो बात इस सूरह के छोटे-छोटे, किन्तु अत्यंत अर्थमय वाक्यों में बयान की गई है, वह यह है कि मानव जीवन के परिणामों के विषय में लोगों की विभिन्न और परस्पर विरोधी धारणाएँ स्वयं इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि इनमें से कोई धारणा भी ज्ञन पर आधारित नहीं है, बल्कि हरेक ने अटकलें दौड़ाकर अपनी जगह जिस दृष्टिकोण की स्थापना कर ली उसी को वह अपनी धारणा बनाकर बैठ गया।

इतनी बड़ी और महत्त्वपूर्ण मौलिक समस्या पर, जिसके विषय में आदमी के अभिमत का ग़लत हो जाना उसके पूरे जीवन को ग़लत करके रख देता है, ज्ञान के बिना मात्र अटकलों के आधार पर कोई धारणा बना लेना एक विनाशकारी मूर्खता है।

ऐसी समस्या के विषय में ठीक अभिमत निर्धारित करने का बस एक ही रास्ता है, और वह यह है कि मनुष्य को आख़िरत (परलोक) के सम्बन्ध में जो ज्ञान ख़ुदा की ओर से उसका नबी दे रहा है उसपर वह गम्भीरतापूर्वक विचार करे और धरती और आकाश की व्यवस्था और स्वयं अपने अस्तित्व पर दृष्टिपात करके खुली आँखों से देखे कि क्या उस ज्ञान के सत्य होने की गवाही हर तरफ मौजूद नहीं है।

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इसके बाद बड़े संक्षिप्त ढंग से एकेश्वरवाद की ओर बुलाते हुए कहा गया है कि तुम्हारे नष्टा ने तुमको दूसरों की बन्दगी के लिए नहीं, बल्कि अपनी दासता के लिए पैदा किया है उपास्यों की तरह नहीं है जो तुमसे आजीविका लेते हैं।

और तुम्हारी सहायता के बिना जिनकी प्रभुता नहीं चल सकती। वह ऐसा उपास्य है जो सबको आजीविका देता है, किसी से आजीविका लेने पर आश्रित नहीं और जिसका प्रभुत्व स्वयं उसके बलबूते पर चल रहा है।

इसी सिलसिले में यह भी बताया गया है कि नबियों (अलै.) का मुकाबला जब भी किया गया है, बुद्धिसंगत आधार पर नहीं, बल्कि उसी दुराग्रह और हठधर्मी और अज्ञानपूर्ण अहंकार के आधार पर किया गया है जो आज मुहम्मद (सल्ल.) के साथ बरता जा रहा है।

फिर मुहम्मद (सल्ल.) को निर्देश दिया गया है कि इन सरक की ओर ध्यान न दें और अपने आमंत्रण और याद दिलाने का कार्य करते रहें, क्योंकि वह इन लोगों के लिए चाहे लाभकारी न हो किन्तु ईमान लाने वालों के लिए लाभप्रद है।

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