सूरह काफ़ (50)

सूरह काफ़
“Surah Qaaf”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:45 verses
पारा:26

नाम रखने का कारण

आरम्भ ही के अक्षर काफ़. से उद्धृत है। मतलब यह है कि वह सूरह जिसका उद्घाटन अक्षर काफ. से होता है।

अवतरणकाल

किसी विश्वस्त उल्लेख से यह पता नहीं चलता कि यह ठीक किस कालखण्ड में अवतरित हुई है, किन्तु विषय-वस्तुओं पर विचार करने से यह महसूस होता हैं कि इसका अवतरणकाल मक्का मुअज्ज़मा का दूसरा कालखण्ड है, जो नुबूवत के तीसरे वर्ष से आरम्भ होकर पाँचवें वर्ष तक रहा। इस कालखण्ड की विशेषताएँ हम सूरह अनआम के परिचय सम्बन्धी लेख में बता चुके हैं।

विषय और वार्ताएँ

विश्वस्त उल्लेखों से मालूम होता है कि अल्लाह के रसूल (सल्ल.) अधिकतर दोनों ईदों की नमाज़ों में इस सूरह को पढ़ा करते थे। कुछ और उल्लेखों में आया है कि फजर की नमाज़ में भी आप अधिकतर इसको पढ़ा करते थे इससे यह बात स्पष्ट है कि नबी (सल्ल.) की दृष्टि में यह एक बड़ी महत्वपूर्ण सूरह थी।

इसलिए आप ज्यादा से ज्यादा लोगों तक बार-बार इसकी वार्ताओं को पहुँचाने का आयोजन करते थे। इसके महत्त्व का कारण सूरह को ध्यानपूर्वक पढ़ने से आसानी से समझ में आ जाता है। पूरी सूरह का विषय आख़िरत (परलोक) है।

अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने जब मक्का मुअज्ज़मा में अपने आह्वान का आरम्भ किया तो लोगों को सबसे ज्यादा अचम्भा आपकी जिस बात पर हुआ, वह यह थी कि मरने के पश्चात् मनुष्य पुनः उठाए जाएँगे और उनको अपने कर्मों का हिसाब देना होगा।

लोग कहते थे कि यह तो बिल्कुल अनहोनी बात है, आखिर यह कैसे सम्भव है कि जब हमारा कण-कण धरती में बिखर चुका हो तो इन बिखरे हुए हज़ारों वर्ष बीत जाने के बाद फिर से इकट्ठा करके हमारा यह शरीर नए सिरे से बना दिया अंशों को जाए और हम जीवित होकर उठ खड़े हों?

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इसके उत्तर में अल्लाह की ओर से यह अभिभाषण अवतरित हुआ। इसमें बड़े संक्षिप्त तरीके से छोटे-छोटे वाक्यों में एक तरफ परलोक की सम्भावना और उसके घटित होने के प्रमाण दिए गए हैं और दूसरी तरफ लोगों को सावधान किया गया है कि तुम चाहे आश्चर्य करो या बुद्धि से बहुत दूर समझो या झुठलाओ, इससे यथार्थ में कोई परिवर्तन नहीं हो सकता।

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