Ya Mujeebu (या मुजीबु) – अल्लाह तआला के नाम की फ़ज़ीलत

AL-MUJEEB (अल मुजीब) दुआएं सुनने और कुबूल करने वाला

अल्लाह तआला मख़लूक़ (बन्दों ) की दुवाओं को सुनता है और कुबूल फरमाता है इसलिए उसे ‘मुजीबु’ कहा जाता है, क्योंकि वह हर सवाल करने वाले का जवाब देता है और हर पुकारने वाले की पुकार सुनता है ।

अल्लाह तआला का खुद इरशाद है कि वह कौन है जो पुकारने वाले की इज़तिराबी (बेबसी) पुकार को कबूल फ्रमाता है अल्लाह

मुजीब है कि वह मजलूमों की पुकार को सुन कर उनके जुल्म को दूर करता है ।

अल्लाह मुजीब है कि वह दुखियों की सदा को सुनकर उनके दुख को मिटाता है । अल्लाह मुजीब है क्यूंकि जब कोई परीशान हाल उसे मदद के लिए बलाता है तो वह उसकी मदद फरमा देता है ।

अल्लाह मुजीब है कि वह अपने वलियों को अपना बनाकर उनकी हर सादा पर लुत्फो करम (खुशी व बखशिश) का इजहार फ्रमाता है ।

अल्लाह मुजीब है कि वह अपने बन्दों के उठे हुए हाथों की लाज रखता है । अल्लाह मुजीब है कि वह उसकी भी सुनता है जो उसे मानता है और उसकी भी सुनता हे जो उसे नहीं मानता | इसलिए मेरे दोस्त! पहले उसे मुजीब कहकर पुकार, फिर उसके हुजूर अपने दिल की ख्वाहिश रख, इन्शा अल्लाह कबूल होगी।

बन्दे को चाहिए कि अल्लाह के हुक्मों को पूरा करे । वह मना करे तो बाज आ जाए, बुलाए तो हाज़िर हो फिर अल्लाह तआला की अता की हुई बकरतों से हर साइल को अता करने की आदत बना ले ।

अगर इख्तियार में नहीं तो प्यारो मुहब्बत से जवाब दे। कितने ही मगरूर कमीने हर हिदायत्त कबूल करने से बचते रहते हैं और कोई दावत दी जाए तो हाजिर नहीं होते, बल्कि अपनी शान व बड़ाई की हिफाजत करते और दावत देने वाले साइल के दिल की परवा नहीं करते ।

हर दुआ कुबुल होने का अमल:

दुआ कुबुल होने का अमल

अगर कोई शख्स यह चाहता हो कि उसकी हर जाइज दुआ कुबूल हो तो उसे चाहिए कि “Ya Mujeebu (या मुजीबु)” को 220 बार रोजाना सोते वक्‍त पढ़ने का रूटीन बना ले, इन्शा अल्लाह उसकी हर जाइज दुआ कुबूल होगी ।

एक आमिल का कौल है कि अगर कोई शख्स इस नाम को जुमां के दिन 100 बार लिखकर तअवीज बनाकर अपने पास रखे तो जो दुआ करेगा अल्लाह कबुल करेगा और जो बात किसी से कहेगा वही मंजूर होगी ।

एक बजुर्ग का कौल है कि दुआ के आगाज में इस नाम को 11 बार पढ़ें उसके बाद जो दुआ मांगनी हो मांगें, आखिर में फिर 11 बार यही “या मुजीबु” पढ़ें, इन्शा अल्लाह दुआ कुबूल होगी ।

मुर्शिद कामिल मिलने का अमल:

जिस शख्स को मुर्शिद कामिल (सही रास्ता बताने वाले बुजुर्ग) न मिलता है या कोई आरिफ कामिल (अल्लाह से कुरबत रखने वाले बुज़ुर्ग) किसी को मुरीद बनाना कुबूल न करता हो तो “या मुजीबु” को दस दिन तक बाद नमाज मगरिब 12500 बार रोजाना पढ़ें । इन्शा अल्लाह ख्वाहिश के मुताबिक अल्लाह का बन्दा मिल जाएगा।

नफ्स की शैतान से हिफाजत करना:

अगर किसी को हर वक्त शैतानी ख्यालात घेरे रखें और उसका दिल हर वक्‍त बुरे और गन्दे ख्यालात में डूबा रहता हो और वह उन गलत किस्म के ख्यालात से छुटकारा हासिल करना चाहता हो तो उसे चाहिए कि वह हर रोज इशा की नमाज के बाद पहले और आखिर में तीन बार दुरूदपाक पढ़े और बीच में 121 बार “Ya Mujeebu” का इन्तिहाई यकसूई (ध्यान लगा कर) और खुलूस नीयत के साथ जिक्र करे ।

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इन्शा अल्लाह कुछ दिनों के अमल से ही उसे अपने नफ़्स पर काबू हासिल हो जाएगा । अल्लाह तआला उसे अपनी हिफाजत में ले लेगा और उसमें शैतान से मुकाबले की हिम्मत व ताकत और साबित कदसी पैदा फरमा देगा ।

कैद से रिहाई का अमल:

से रिहाई का अमल

अगर कोई नाजाइज़ तौर पर अपने बाल बच्चों से जुदा होकर कैद में मुब्तिला हो गया हो या किसी का पता न चलता हों तो कुछ आदमी इकठठे हों और गिनकर इस नाम को सवां लाख बार पढ़ें, पढ़ाई मकम्मल होने पर तमाम पढ़ने वाले सर सजदे में रखकर कैदी की कैद से रिहाई के लिए दुआ करें ।

इस तरह सात रोज तक यही अमल करें । इन्शा अल्लह कैद से रिहाई होगी और कैदी हिफाज़त से अपने बीवी बच्चो में आ जाएगा ।

Ya Khabeeru (या ख़बीरु) Benefits – अल्लाह तआला के नाम की फ़ज़ीलत

दुकान व माल की हिफाज़त:

अगर किसी को अपनी दुकान, माल और सामान वगैरह की हिफाज़त करना मकसूद हो और उसे चोरों, डाकुओं वगैरह का खतरा हो तो वह सात बार यह “या मुजीबु” बावज़ू पढ़े और दम करे फिर साथ ही अपनी शहादत की उंगली से अपनी दकान व मकान वगैरह का हिसार करे और अल्लाह तआला के सुपुर्द करने का ख्याल करे । इन्शा अल्लाह मालों असबाब महफूज रहेगा ।

खैरियत के साथ रहना:

अगर कोई हर रोज घर से बाहर निकलने से पहले गिनती के मुताबिक यह “या मुजीबु” पढे और अपने ऊपर दम करे तो वह खैरियत के साथ घर वापस आएगा और उसका तमाम दिन बहुत अच्छा गुज़रेगा । कोई भी दुशमन उसे नुकसान न पहुंचा सकेगा ।

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