मुस्लिम देशों में महिलाओं को अभी तक वोट का अधिकार क्यों नहीं दिया गया है?

सभी मुस्लिम देश जिन्होंने लोकतंत्र को अपनाया है। वह महिलाओं और पुरुषों को वोट देने और चुनाव लड़ने का समान अधिकार प्रदान करते हैं ।

महिलाओं ने न केवल वोट दिया है बल्कि उन्होंने कुछ देशों जैसे तुर्की (तानसु सिलर 1993 से 1996 तक प्रधानमन्त्री रहीं), बांग्लादेश (सन्‌ 1991 से लगातार सरकार का नेतृत्व दो बेगमात करती हैं), पाकिस्तान (बेनजीर भुटूटों दो बार प्रधानमन्त्री बनीं) और सबसे अधिक मुस्लिम जनसंख्या वाला देश इण्डोनेशिया (जहाँ मेघावती सुकार्नोपुत्री चार वर्ष के लिए राष्ट्राध्यक्ष रहीं) आदि का नेतृत्व किया है।

women voting right

केवल छः खाड़ी के देशों में जहाँ राजा राज करते हैं । वहाँ स्त्री और पुरुष किसी को वोट देने का अधिकार नहीं है। बहरहाल कुवैत में एक चुनी हुई संसद है जहाँ महिलाओं को वोट देने की भी अनुमति है और चुनाव लड़ने की भी ।

बहरहाल कुवैत की संसद के पास सीमित अधिकार हैं और इसके फैसलों को कुवैत का अमीर रद कर सकता है। सऊदी अरब ने निकायों से लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का आरम्भ किया है जहाँ केवल पुरुष ही मताधिकार का प्रयोग कर सकते हैं ।

महिलाओं को पहले सभी चुनावों में मतदान करने या किसी भी राजनीतिक कार्यालय के लिए चुने जाने से मना किया गया था, लेकिन 2011 में किंग अब्दुल्ला ने 2015 के स्थानीय चुनावों में महिलाओं को वोट देने दिया और उन्हें सलाहकार सभा में नियुक्त किया गया।

महिलाओं से 2015 के बाद मताधिकार का वादा किया गया है। आशा है कि शाहों दारा शासित यह देश जल्द ही अन्य देशों का अनुकरण करते हुए महिलाओं को वोट देने और चुनाव लड़ने का अधिकार देंगे।

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बहरहाल लोगों को मताधिकार देने से पहले लोकतन्त्र आना चाहिए। यह याद रखना लाभदायक होगा कि अधिकतर पश्चिमी लोकतन्त्रों में महिलाओं को मताधिकार पिछली सदी के प्रारम्भ में ही मिल सका था।

लेकिन राजशाही केवल मुस्लिम देशों तक ही सीमित नहीं है। चीन दुनिया की एक शक्ति होने के बावजूद कम्युनिस्ट पार्टी की तानाशाही के अन्तर्गत है और वहाँ किसी को वोट देने का अधिकार नहीं है।

जहाँ तक इस्लाम का सम्बन्ध है, वह राजनीतिक परामर्श के मामले में पुरुषों और महिलाओं में अन्तर नहीं करता । पैगम्बर (सल्ल0) की मृत्यु के बाद खिलाफत काल में खलीफा की नियुक्ति परामर्श (सूरा) की प्रक्रिया के बाद होती थी जिसमें महिलाओं और पुरुषों दोनों से परामर्श लिया जाता था। एक बार जब खलीफा की नियुक्ति हो जाती तो महिलाएँ और पुरुष दोनों उनसे बैअत करने के लिए आते थे।

जब हम इस्लामी इतिहास के आरंभिक काल में जाते हैं तो हम देखते हैं कि तीसरे खलीफा की चुनाव प्रक्रिया में प्रसिद्ध सहाबी अब्दुल रहमान इब्ने औफ ने मदीना के प्रत्येक व्यक्ति से मत लेने की जिम्मेदारी ली थी कि वह मालूम करें कि इस्लामी राज्य की जिम्मेदारी के मामले में लोगों का दृष्टिकोण क्या है? वास्तव में इस प्रक्रिया में उन्हें मदीना के प्रत्येक महिला और पुरुष से और उनसे दृष्टिकोण मालूम करना था। अपने प्रयासों के बाद उन्होंने घोषणा कीः

“मैंने मदीना के प्रत्येक व्यक्ति- पुरुष, महिला और युवक- से दृष्टिकोण मालूम किया और यह पाया कि उनमें से सभी अली से पहले उस्मान को खलीफा बनाना पसन्द करते हैं”

इससे हमें संकेत मिलता है कि उन महिलाओं से भी परामर्श लिया गया जो अपने घरों में छिपी हुई थीं । इस प्रकार महिलाओं को मताधिकार से वंचित करना किसी भी इस्लामी साक्ष्य पर आधारित नहीं है। और वास्तव में यह पैगम्बर के सहाबियों ने निश्चित रीति के विरुद्ध है जो सर्वसम्मति के लिए उपयुक्त है।

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