पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल0) की युद्ध धारणा

इस्लाम से पहले और गैर इस्लामी युद्ध मात्र लूटमार, कत्ल, हिंसा और अत्याचार पर आधारित युद्धों से अधिक हैसियत नहीं रखते थे। इन युद्धों का उद्देश्य विजय प्राप्त करना, कमजोरो का शोषण करना, घरों, फसलों, खेतों और खलिहानों, यहाँ तक कि सभी गाँव तथा कस्बों को नष्ट करना होता था।

इनके लिए युद्ध औरतों के सतीत्व और पवित्रता से खिलवाड़ करना, बूढ़ों, बच्चों और जानवरों से कठोरता पूर्ण व्यवहार करना और धरती पर उपद्रव और फसाद फैलाने का मात्र माध्यम हुआ करते थे।

नैतिक सिद्धांतों की सीमा में रहकर युद्ध करने की विचारधारा लंबे समय से मानव चेतना से मिट चुकी थी ।

पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल0) की युद्ध धारणा

इस्लामी युद्ध इस्लाम से पहले के युद्धों और गैर इस्लामी युद्धों से पूर्णतया भिन्न हैं। इस्लाम के अंदर युद्ध एक ऐसे समाज की स्थापना के लिए अल्लाह की राह में महान और पवित्र संघर्ष करना है जो मानवता को बर्बरता, हिंसा और दमन से मुक्त करना चाहता है ।

हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) ने इस्लाम से पहले के युद्धों और गैर इस्लामी युद्धों के पैमानों और उद्देश्यों को पूर्णतः बदल दिया ।

जिहाद फी सबीलिल्लाहअल्लाह के मार्ग में संघर्ष

हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने युद्ध के दौरान अनेक महत्वपूर्ण नैतिक सिद्धांत ों पर अमल करने पर बल दिया । पहला, आप (सल्ल0) ने मौलिक रूप से युद्ध की मौलिक विचारधारा और बोध को नये सिरे से क्रमबद्ध किया ।

अल्लाह के मार्ग में संघर्ष की बिल्कुल नई शब्दावली को परिचित कराकर आप (सल्ल0) ने शुद्ध भौतिक या व्यक्तिगत हितों या व्यक्तिगत लाभों के प्रेरकों से युद्ध को पवित्र कर दिया ।

जिहाद का अर्थ संघर्ष या प्रतिरोध है या किसी के माध्यम से थोपे गए अन्याय और अत्याचार को दूर करने का संगठित प्रयास कहा जाता है। फी सबीलिल्लाह (अल्लाह के मार्ग में) की वृद्धि करके आप (सल्ल0) ने यह शिक्षा दी कि युद्ध गर्व, स्वाभिमान, व्यक्तिगत सम्मान या लोगों को दबाने के लिए नहीं होना चाहिए ।

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इस विश्वास ने एक सम्पर्क सूत्र का काम किया जिसने युद्ध के सिद्धांत  को एक दूसरे से निकट कर दिया और इससे जुड़े हुए सभी संभावित अत्याचारों को नियंत्रण में रखा ।

युद्ध की इस नयी विचारधारा के अंतर्गत पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल0) ने नियमों का एक व्यापक और पूर्ण नुस्खा परिचित कराया, जिसमें युद्ध, उसकी नैतिक सीमाएँ, अधिकार और कर्तव्य, योद्धा और निहत्थे व्यक्तियों का अंतर और उनके अधिकार, दूतों के अधिकार, युद्धबंदियों और पराजित कौमों के अधिकारों को एक जगह कर दिया गया है।

बच्चों, औरतों, कमजोरों और बूढ़े लोगों की हत्या न करना

यह सभी नियम मुहम्मद (सल्ल0) के माध्यम से स्पष्ट रूप से वर्णित किए गए हैं। हज़रत अबू बक्र सिद्दीक (रजि0) इस्लाम के पहले खलीफा थे । उन्होंने सीरिया नामक देश की ओर इस्लामी सेना को रवाना करते समय, जो कुछ कहा, वह इस्लाम के युद्ध नियमों के दिशा निर्देशक सिद्धांत  हैं।

हज़रत अबू बक्र (रजि0) इस्लाम के पैगम्बर हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) के सबसे निकट साथी थे और उन्होंने ये दिशा निर्देशक सिद्धांत  स्वयं पैगम्बर (सल्ल0) से सुने थे। यह दिशा-निर्देशक सिद्धांत  इस्लाम की युद्ध सम्बन्धी शिक्षाओं का दर्पण हैं ।

हज़रत अबू बक्र सिद्दीक (रजि0) ने कहाः

“बच्चों, औरतों, कमजोरों और बूढ़े लोगों की हत्या न करना। धोखा देने की
कोई कारवाई मत करना, अल्लाह के मार्ग से विचलित न होना और न ही
अधिकार को हानि पहुँचाना । पेड़ों को न काटना, घरों और खेतों को न जलाना,
फलदार पेड़ों को मत काटना और मवेशियों की हत्या न करना सिवाय इस
स्थिति में कि तुम्हें खाने की आवश्यकता हो । जब तुम आगे बढ़ोगे तो तुम्हें
कुछ मठों में बैठे हुए लोग मिलेंगे जो मठों के अन्दर एकान्त में अल्लाह की
इबादत करते होंगे, उनको क्षमा करना, उनकी हत्या न करना और न ही उनके
पूजा स्थलों को नष्ट करना ।”

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यह अत्यंत मौलिक और महत्वपूर्ण शिक्षाएं थी और युद्ध के दौरान की विभिन्न स्थितियों में पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल0) के द्वारा दिए गए निर्देशों की रोशनी में इस्लामी सेना के सेनापति हज़रत ओसामा बिन जैद (रज़ि0) को बतायी गयी ।

इन कुछ ही वाक्यों में हज़रत अबू बक्र (रजि0) ने हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) की युद्ध की शिक्षाओं के नियमों का वर्णन कर दिया है। 

उपरोक्त उपदेशों से यह स्पष्ट है कि इस्लाम ने न केवल युद्ध न लड़ने वाले और कमजोर व्यक्तियों के सम्बन्ध में सहानुभूति और दया का आदेश दिया है बल्कि पशुओं और माहौल के सम्बन्ध में भी स्पष्ट निर्देश दिए हैं ताकि इन सभी प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा की जा सके, जो मानव नस्ल के जीवन और स्थायित्व के लिए अत्यंत आवश्यक हैं ।

सभी मनुष्य आपस में भाई-भाई हैं

यदि मात्र दिशा-निर्देशक निर्देश पर अमल किया जाए तो यह संसार निश्चित रूप से मनुष्यों के लिए एक बेहतर और सुरक्षित जगह होगा ।

लेकिन पिछले युद्धों से होने वाली बर्बादी और विनाश देखते हुए यह अनुमान होता है कि मनुष्य ने मानवता को किस सीमा तक पीछे छोड़ दिया है।

पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल0) ने फरमाया:

ऐ अल्लाह! मैं इस बात की गवाही देता हूँ कि सभी मनुष्य आपस में भाई-भाई हैं ।

मानवता की प्रतिष्ठा और सम्मान के सम्बन्ध में पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल0) के आदर्श पर दृष्टि डालिए । आप (सल्ल0) एक बार अपने साथियों के बीच बैठे हुए थे कि उधर से एक शव-यात्रा गुज़री । पैगम्बर (सल्ल0) मृतक के सम्मान के लिए खड़े हो गए।

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आपके साथियों को आश्चर्य हुआ और उन्होंने पैगम्बर (सल्ल0) को याद दिलाया कि यह शवयात्रा एक यहूदी की शवयात्रा है । पैगम्बर (सल्ल0) ने उनसे पूछा:

‘क्या यह मनुष्य न था?’ इस सम्बन्ध में हमें कुरान की इस प्रतिष्ठित आयत को नहीं भूलना चाहिए जिसमें मनुष्य के प्राण की पवित्रता बयान की गई है “जिसने किसी व्यक्ति को किसी के खून का बदला लेने या धरती में फ़साद फैलाने के अतिरिक्त किसी और कारण से मार डाला तो मानो उसने सारे ही इंसानों की हत्या कर डाली । और जिसने उसे जीवन प्रदान किया, उसने मानो सारे इन्सानों को जीवन दान किया ।” (सूर: माइदा, 32)

एक युद्ध में जब दुश्मन की सेना के साथ कुछ बच्चे भी मारे गए और इसकी सूचना हजरत मुहम्मद (सल्ल0) को मिली तो आप बहुत दुखी हुए और नाराजगी प्रकट की। इस पर एक व्यक्ति ने कहाः

“ऐ अल्लाह के पैगम्बर (सल्ल0)! आप क्यों दुखी होते हैं । वह तो गैर मुस्लिमों के बच्चे थे।”

आप (सल्ल0) ने उत्तर दिया, “गैर मुस्लिमों के बच्चे तुमसे बेहतर थे । बच्चों की हत्या न करो । खबरदार… बच्चों की हत्या न करो । हर इंसान अल्लाह की प्रकृति पर पैदा होता हैं ।”

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