सूरह तौबा (9)

सूरह तौबा
“Surah Tawbah”

कहाँ नाज़िल हुई:मदीना
आयतें:129 verses
पारा:10-11

नाम रखने का कारण

यह सूरा दो नामों से प्रसिद्ध है। एक अत्-तौबा, दूसरा अल्-बराअत। तौबा इस दृष्टि से कि इसमें एक जगह कुछ ईमान वालों के कुसूरों के माफ करने का उल्लेख है। अल्-बराअत इस दृष्टि से कि इसके आरंभ में बहुदेववादियों के संबंध में उत्तरदायित्व से मुक्त होने की उद्घोषणा की गई है।

बिस्मिल्लाह न लिखने का कारण

इस सूरह के आरंभ में “बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम” नहीं लिखा जाता क्योंकि नबी (सल्ल.) ने स्वयं नहीं लिखवाई थी।

अवतरणकाल और सूरह के विभिन्न अंश – यह सूरह तीन अभिभाषणों पर आधारित है।

पहला भाषण सूरह के आरंम्भ से आयत 37 तक चलता है। इसका अवतरणकाल जी-कादा सन् 09 हिजरी या इसके लगभग है। नबी (सल्ल.) इस वर्ष हज़रत अबू बक्र (रजि.) को हाजियों का अमीर (अध्यक्ष) नियुक्त करके मक्का भेज चुके थे कि यह अभिभाषण अवतरित हुआ और नबी (सल्ल.) ने तुरंत हज़रत अली (रजि.) को उनके पीछे भेजा, ताकि हज के अवसर पर सम्पूर्ण अरब के प्रतिनिध सम्मेलन में इसे सुनाएं और इसके अनुसार जो कार्य प्रणाली प्रस्तावित की गई थी उसकी घोषणा कर दें।

दूसरा अभिभाषण आयत 38 से आयत 72 तक चलता है। यह रजब सन् 09 हिजरी या इससे कुछ पहले अवतरित हुआ जबकि नबी (सल्ल.) तबूक के अभियान की तैयारी कर रहे थे। इसमें ईमान वालों को जिहाद पर उभारा गया है और (कपटाचारियों और कमजोर ईमान वालों की सख्ती के साथ भर्त्सना की गई है।

तीसरा अभिभाषण आयत 73 से आरंभ होकर सूरह के साथ समाप्त होता है और यह तबूक के अभियान से लौटने पर अवतरित हुआ। इसमें कपटाचारियों की गतिविधियों पर चेतावनी, तबूक के अभियान में पीछे रह जाने वालों को डांट-डपट और उन सच्चे ईमान वालों पर भर्त्सना के साथ क्षमादान की घोषणा है, जो अपने ईमान में सच्चे थे किन्तु अल्लाह की राह में जिहाद में हिस्सा नहीं लिया था।

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