सूरह स्वाद (38)

सूरह स्वाद
“Surah Saad”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:88 verses
पारा:23

नाम रखने का कारण

आरम्भ ही के अक्षर सौंद. को इस सूरह का नाम दिया गया है।

अवतरणकाल

जैसा कि आगे चलकर बताया जाएगा कि कुछ उल्लेखों के अनुसार यह सूरह उस समय अवतरित हुई थी जब नबी (सल्ल.) ने मक्का मुअज्ज़मा में खुले तौर पर आह्वान का आरम्भ किया था।

कुछ दूसरे उल्लेख इसके अवतरण को हज़रत उमर (रज़ि.) के ईमान लाने के पश्चात् की घटना बताते हैं। एक और उल्लेखों के सिलसिले से ज्ञात होता है कि इसका अवतरणकाल नुबूवत का दसवाँ या ग्यारहवाँ वर्ष है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

इमाम अहमद, नसई और तिरमिज़ी आदि ने जो उल्लेख उद्धृत किए हैं उनका सारांश यह है कि जब अबू तालिब बीमार हुए और कुरैश के सरदारों ने महसूस किया कि अब यह इनका अन्तिम समय है, तो उन्होंने आपस में परामर्श किया कि चलकर महाशय से बात करनी चाहिए।

इस पर सब सहमत हो गए और कुरैश के लगभग 25 सरदार, जिनमें अबू जहल, अबू सुफियान, उमैया बिन खल्फ, आस बिन वाइल, अस्वद बिन मुत्तलिब, उक्बा बिन अबी मुऐत, उतबा और शैवा सम्मिलित थे, अबू तालिब के पास पहुँचे।

इन लोगों ने पहले तो अपनी सामान्य नीति के अनुसार नबी (सल्ल.) के विरुद्ध अपनी शिकायतें बयान कीं, फिर कहा कि हम आपके सामने एक न्याय की बात रखने आए हैं। आपका भतीजा हमें हमारे धर्म पर छोड़ दे और हम उसे उसके धर्म पर छोड़ देते हैं।

किन्तु वह हमारे उपास्यों का विरोध और उनकी निन्दा न करे। इस शर्त पर आप हमसे उसका समझौता करा दें। अबू तालिब ने नबी (सल्ल.) को बुलाया और आप (को यह बात बताई जो कुरैश के सरदारों ने उनसे कही थी ।) नबी (सल्ल.) ने जवाब में कहा: चचा जान, मैं तो इनके सामने एक ऐसी बात पेश करता हूँ जिसे अगर ये मान लें तो अरब इनके अधीन हो जाएँ और ग़ैर अरब इन्हें कर (Tax) देने लग जाएँ। उन्होंने पूछा : “वह बात क्या है?’’

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आपने कहा: “ला इला-ह इल्लल्लाह” (अल्लाह के अतिरिक्त कोई पूज्य नहीं।)

इस पर वे सब एक साथ उठ खड़े हुए और वे बातें कहते हुए निकल गए जो इस सूरह के आरम्भिक भाग में अल्लाह ने उधृत की है।

इब्ने साद के उल्लेख के अनुसार, यह अबू तालिब के मरण-रोग की नहीं, बल्कि उस समय की घटना है जब नबी (सल्ल.) ने सामान्य रूप से लोगों को सत्य की ओर बुलाना शुरू कर दिया था और मक्का में निरन्तर ये ख़बरें फैलनी शुरू हो गई थीं कि आज अमुक व्यक्ति मुसलमान हो गया और कल अमुक। 

ज़मड़शरी, राज़ी, नेसाबूरी और कुछ दूसरे टीकाकार कहते हैं कि ये प्रतिनिधि मंडल अबू तालिब के पास उस समय गया था जब हज़रत उमर (रजि.) के ईमान लाने पर कुरैश है। सरदार बौखला गए थे।

विषय और वार्ताएँ

ऊपर जिस मजलिस का उल्लेख किया गया है उसकी समीक्षा करते हुए इस सूराह का आरम्भ हुआ। काफिरों और नबी (सल्ल.) की बातचीत को आधार बनाकर अल्लाह ने बताया है कि उन लोगों के इन्कार का वास्तविक कारण इस्लाम आह्वान की कोई त्रुटि नहीं है, बल्कि उनका अपना अहंकार और ईर्ष्या और अंधानुकरण परदुराग्रह है।

इसके बाद अल्लाह ने सूरह के आरम्भिक भाग में भी और अन्तिम वाक्यों में भी काफिरों को साफ-साफ चेतावनी दी है कि जिस व्यक्ति का तुम आज मज़ाक उड़ा रहे हो, निकट समय में वही विजयी होकर रहेगा और वह समय दूर नहीं जब उसके आगे तुम सब नतमस्तक दिखाई दोगे।

फिर निरन्तर नौ पैग़म्बरों का उल्लेख करके, जिनमें हज़रत दाऊद (अलै) और सुलैमान (अलै) का वृत्तान्त अत्यन् विस्तृत है।

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अल्लाह ने यह बात हृदयांकित कराई है कि उसका न्याय-विधान बिल्कुल निष्पक्ष है। अनुचित बात चाहे कोई भी करे वह उस पर पकड़ता है और उसके यहाँ वही लोग पसन्द किए जाते हैं जो गलती सुनने वालों के पर हठ न करें, बल्कि उससे सचेत होते ही तौबा कर लें।

इसके पश्चात् आज्ञाकारी बन्दों और सरकश बन्दों के उस परिणाम का चित्रण किया गया है जो वे परलोक में देखने वाले हैं। अन्त में आदम (अलै) और इब्लीस के किस्से का उल्लेख किया गया है और इससे अभीष्ट कुरैश के काफिरों को यह बताना है कि मुहम्मद (सल्ल.) के आगे झुकने से जो अहंकार तुम्हें रोक रहा है उसी अहंकार ने आदम के आगे झुकने से इब्लीस को रोका अतः जो परिणाम इब्लीस का होना है वही अन्ततः तुम्हारा भी होना है।

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