सूरह मोमीन (40)

सूरह मोमीन
“Surah Ghafir”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:85 verses
पारा:24

नाम रखने का कारण

आयत 28 के वाक्यांश – “फिरऔन के लोगों में से एक ईमान रखने वाला (अल-मोमिन) व्यक्ति बोल उठा” से उद्धृत है अर्थात् वह सूरह जिसमें उस विशेष ईमानवाले (मोमिन) का उल्लेख हुआ है

अवतरणकाल

इब्ने अब्बास (रजि.) और जाबिर इब्ने ज़ैद (रजि.) का बयान है कि यह सूरह जुमर के पश्चात् संसर्गतः अवतरित हुई है और उसका जो स्थान कुरआन मजीद के वर्तमान क्रम में है वही क्रम अवतरण के अनुसार भी है।

अवतरण की परिस्थितियाँ

जिन परिस्थितियों में यह सूरह अवतरित हुई है, उनकी ओर स्पष्ट संकेत इसकी वार्ता में पाए जाते हैं। मक्का के काफिरों ने उस समय नबी (सल्ल.) के विरुद्ध दो प्रकार की कार्रवाइयाँ शुरू कर रखी थीं।

एक यह कि हर तरफ़ झगड़े और विवाद छेड़कर और नित नए मिथ्या रोपण द्वारा कुरआन की शिक्षा और इस्लाम के आह्वान और स्वयं नबी (सल्ल.) के विषय में अधिक से अधिक संदेह और शंकाएं लोगों के दिलों में पैदा कर दिए जाएँ।

दूसरे यह कि आपको कत्ल कर देने के लिए वातावरण बनाया जाए। अतएव वे इस उद्देश्य के लिए निरन्तर षडयंत्र कर रहे थे।

विषय और वार्ताएँ

परिस्थिति के इन दोनों पहलुओं को अभिभाषण के आरम्भ ही में स्पष्ट कर दिया गया है और आगे का सम्पूर्ण अभिभाषण इन्हीं दोनों की एक अत्यंत प्रभावकारी और शिक्षाप्रद समीक्षा है।

कत्ल के षड्यंत्र के जवाब में फिरऔनियों में से एक मोमिन व्यक्ति का वृत्तान्त प्रस्तुत किया गया है (आयत 23 से लेकर 55 तक)। और इस वृत्तान्त के रूप में तीन गिरोहों को तीन भिन्न शिक्षाएं दी गई हैं :

ये भी पढ़े -   सूरह तलाक (65)

(1) काफिरों को बताया गया कि जो कुछ तुम मुहम्मद (सल्ल.) के साथ करना चाहते हो, यही कुछ अपनी ताकृत के भरोसे पर फिरऔन हज़रत मूसा (अलै.) के साथ करना चाहता था। अब क्या ये हरकतें करके तुम भी उसी परिणाम को देखना चाहते हो, जिस परिणाम को उसे देखना पड़ा था ?

(2) मुहम्मद (सल्ल.) और उनके अनुयायियों को शिक्षा दी गई है कि (इन ज़ालिमों की बड़ी से बड़ी भयानक धमकी) के जवाब में बस अल्लाह की पनाह माँग लो और इसके बाद बिल्कुल निर्भय होकर अपने काम में लग जाओ।

इस तरह अल्लाह के भरोसे ख़तरों और आशंकाओं से बेपरवाह होकर काम करोगे तो अन्ततः उसकी मदद आकर रहेगी, आज के फ़िरऔन भी वही कुछ देख लेंगे जो कल के फिरऔन देख चुके। 

(3) इन दोनों गिरोहों के अतिरिक्त एक तीसरा गिरोह भी समाज में मौजूद था और वह उन लोगों का गिरोह था जो मन में जान चुके थे कि सत्य मुहम्मद (सल्ल.) ही के साथ है।

किन्तु यह जान लेने के बावजूद वे चुपचाप सत्य और असत्य के इस संघर्ष वे का तमाशा देख रहे थे। अल्लाह ने इस अवसर पर उनकी अन्तरात्मा को झकझोरा है और उन्हें बताया है कि जब सत्य के शत्रु खुल्लम-खुल्ला तुम्हारी आँखों के सामने इतना बड़ा अत्याचारपूर्ण कदम उठाने पर तुल गए हैं तो अफ़सोस है तुम पर यदि अब भी तुम बैठे तमाशा ही देखते रहो।

इस हालत में जिस व्यक्ति की अन्तरात्मा बिल्कुल मर न चुकी हो उसे तो उठकर वह कर्तव्य निभाना चाहिए जो फ़िरऔन के भरे दरबार में उसके अपने दरबारियों में से एक सत्यवादी व्यक्ति ने उस वक्त निभाया था जब फ़िरऔन ने हज़रत मूसा ( अलै.) को कत्ल करना चाहा था।

Leave a Reply