सूरह हा मीम (अस्-सज्दा-41)

सूरह हा मीम
“Surah Fussilat”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:54 verses
पारा:24-25

नाम रखने का कारण

इस सूरह का नाम दो शब्दों से मिलाकर बना है। एक हा. मीम. दूसरे अस्-सज्दा। मतलब यह है कि वह सूरह जिसका आरम्भ हा. मीम. से होता है और इसमें एक स्थान पर सज्दा की आयत आई है।

अवतरणकाल

विश्वस्त उल्लेखों के अनुसार इसका अवतरणकाल हज़रत हमज़ा (रजि.) के ईमान लाने के बाद और हज़रत उमर (रजि.) के ईमान लाने से पहले है।

प्रसिद्ध ताबई मुहम्मद बिन काब अल-फर्जी (से उल्लेखित) है कि एक बार कुरैश के कुछ सरदार मस्जिदे हराम में महफ़िल जमाए बैठे थे। और मस्जिद के एक दूसरे गोशे में अल्लाह के रसूल (सल्ल.) अकेले मौजूद थे। उतबा बिन रबीआ ने कुरैश के सरदारों (के परामर्श से नबी (सल्ल.) के पास जाकर) कहा, “भतीजे, यह काम जो तुमने शुरू किया है, इससे यदि तुम्हारा उद्देश्य धन प्राप्त करना है तो हम सब मिलकर तुम को इतना कुछ दे देते हैं कि तुम हममें सबसे अधिक धनवान हो जाओ।

यदि इससे अपनी बड़ाई चाहते हो तो हम तुम्हें अपना सरदार बना लेते हैं। यदि बादशाही चाहते हो तो हम तुम्हें अपना बादशाह बना लेते हैं और यदि तुमपर कोई जिन्न आता है तो हम अपने खर्च पर तुम्हारा इलाज कराते हैं।”

उतबा यह बातें करता रहा और नबी (सल्ल.) चुपचाप सुनते रहे। फिर आपने कहा, “ऐ अबुल वलीद! आपको जो कुछ कहना था कह चुके ?” उसने कहा, “हाँ।” आप (सल्ल.) ने कहा, “अच्छा, अब मेरी सुनो।” इसके बाद आपने बिसमिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम (अल्लाह के नाम से जो अत्यन्त कृपाशील और दयावान् है) पढ़कर इसी सूरह को पढ़ना शुरू किया और उतबा अपने दोनों हाथ पीछे ज़मीन पर टेके ध्यान से सुनता रहा।

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सज्दा की आयत 38 पर पहुँचकर आपने सज्दा किया और सिर उठाकर कहा, “ऐ अबुल वलीद ! मेरा जवाब आपने सुन लिया, अब आप जाने और आपका काम।” उतबा उठकर कुरैश के सरदारों के पास वापस आया और उनसे उसने कहा: “अल्लाह की क़सम, मैंने ऐसी वाणी सुनी कि कभी इससे पहले नहीं सुनी थी। ईश्वर की सौगन्ध, न यह काव्य है, न जादू है, न कहानत (भविष्य-वक्ताओं की वाणी)।

ऐ कुरैश के सरदारो! मेरी बात मानो और इस व्यक्ति को इसके हाल पर छोड़ दो। मैं समझता हूँ कि यह वाणी कुछ रंग लाकर रहेगी। कुरैश के सरदार उसकी ये बात ही बोल उठे, “वलीद के पिता, आख़िर उसका जादू तुमपर भी चल गया।”

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