शहादत या ईमान की घोषणा – इस्लाम का पहला मूल स्तम्भ

शहादत या ईमान की घोषणा करने का अर्थ इस्लामी समुदाय की सदस्यता ग्रहण करना हैः अरबी में यह घोषणा इन शब्दों में की जाती हैः

‘ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदु र्रसूलुल्लाह’ 

इसका अर्थ है: “अल्लाह के सिवा कोई उपासना योग्य नहीं और मुहम्मद अल्लाह के पैग़स्बर हैं”

शहादत या गवाही देना इस्लाम धर्म के 5 मूल स्तम्भो में से पहला स्तम्भ है। जो लोग कुरआन को अल्लाह की वाणी और मुहम्मद को अल्लाह का पैग़म्बर स्वीकार करते हैं। उन्हें मुसलमान कहा जाता है।

शहादत

एक मुसलमान शहादत का कालिमा पढ़कर अपने मुसलमान होने की घोषणा करता है।

इस साधारण घोषणा का व्यापाक अर्थ है और इसके परिणामस्वरूप मुसलमान के जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ते हैं, जैसे-

  • इसका अर्थ यह है कि वास्तविक अस्तित्व केवल अल्लाह का ही अस्तित्व है। यह पूरा अस्तित्व केवल इसलिए है क्योंकि अल्लाह इनका अस्तित्व जारी रखना चाहता है।
  • चूँकि हमारा अस्तित्व अल्लाह की मर्जी और कृपा से है इसलिए हम पूरी तरह उसपर निर्भर हैं। अल्लाह से हमारा सम्बन्ध सेवक और स्वामी जैसा है।
  • हम अल्लाह के सामने अपने विचारों और कर्मों के लिए उत्तरदायी होंगे जिसके सामने हमें क़यामत के दिन अपने सांसारिक कर्मों का हिसाब देना होगा और उस दिन वह फैसला करेगा कि आख़िरत या परलोक में हमारी अन्तिम मंजिल कहाँ होगी।
  • अन्तिम फैसले के लिए अपने आप को तैयार करने के लिए हमें अल्लाह की मर्जी के अनुसार नेक और जिम्मेदारा जीवन व्यतीत करना चाहिए।
  • अल्लाह की मर्जी का ज्ञान केवल उसके पैगम्बरों के माध्यम से ही हो सकता है।इसलिए अल्लाह पर ईमान के लिए उसकी वह्यी अर्थात उसकी किताब और उसके पैगम्बरों पर ईमान लाना आवश्यक है।
  • सभी क़बीलों और देशों में भेजे गए पैगम्बरों में से मुहम्मद (सल्ल0) अन्तिम पैग़म्बर हैं जो पैग़म्बरी पर मुहर लगाने वाले हैं और वह्यी की प्रक्रिया को पूरी करने वाले हैं।
  • चूँकि अल्लाह अदृश्य है और मानव समझ से परे है। इसलिए वह अपना संदेश अपने पैग़म्बरों के पास, अपने कार्यकर्त्ताओं अर्थात्‌ फ़रिश्तो द्वारा भेजता है।
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