इस्लामी कानून में महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले विरासत आधी क्यों मिलती है?

पिता की संपत्ति में बेटी का अधिकार बेटे से आधा क्यों?

इस्लाम से पहले अरब समाज में केवल बेटे ही अपने बाप से विरासत में हिस्सा पाते धे। लेकिन कुरान ने आदेश दिया कि बेटियों को भी पिता की संपत्ति से बेटों के मुकाबले विरासत में आधा हिस्सा दिया जाए।

उस समय के समाज में यह एक क्रांतिकारी कदम था, जहां औरतें स्वयं संपत्ति समझी जाती थीं और उन्हें विरासत में बाप से बेटे को स्थानांतरित किया जाता था ।

इसके दो उद्देश्य थे । पहला यह कि औरतों को स्वतन्त्र और स्वाधीन व्यक्तित्व के रूप में स्वीकृति दी जाए और दूसरे उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाया जाए।

कुरान ने आदेश दिया कि महिलाओं को अपने बाप, अपने पति और अपने बेटों के द्वारा छोड़ी हुई संपत्ति में हिस्सा दिया जाए, यहाँ तक कि बेऔलाद भाइयों की संपत्ति में से भी ।

Property Distribution in Islam

तीन आयतें जिनमें निकट सम्बन्धियों के हिस्सों के बारे में विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है वह सूर: अन-निसा (आयत 11-12 और 176) हैं।

इन तीन आयतों में अल्लाह तआला ने बच्चों, माता-पिता और दम्पत्ति के अधिकारों को विशेष हिस्से के अनुसार निर्धारित कर दिया है और इसे मनुष्य के फैसले और इसकी भावनाओं पर नहीं छोड़ा गया है ।

विरासत की इस्लामी व्यवस्था पूर्ण रूप से रचयिता के पास मानवीय आवश्यकताओं का सर्वोत्तम ज्ञान होने के कारण पूर्णतः संतुलित है।

यदि आज के सन्दर्भ में देखा जाए तो महिलाओं को पुरुषों की तुलना में अपने पिता की विरासत से आधा हिस्सा दिया जाना अन्यायपूर्ण प्रतीत हो सकता है परन्तु जब कोई सातवीं शताब्दी के अरब समाज की स्थिति पर विचार करे तो यह स्पष्ट होगा कि यह पैगम्बर और इस्लाम की ओर से एक विशेष आरम्भ था और महिलाओं को संपत्ति और संसाधनों का स्वामी बनाने का एक कदम था।

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उससे पहले वह संपत्ति के स्वामित्व, नियंत्रण, प्रयोग और उपयोग तथा निवेश के बारे में कल्पना भी नहीं कर सकती थीं । हमें इस तथ्य को स्वीकार करना चाहिए कि महिलाओं को अपने भाईयों की तुलना में आधा हिस्सा दिया गया है और उनका हिस्सा आधा नहीं कर दिया गया है। यदि इस संदर्भ में देखा जाए तो कोई भी व्यक्ति इस कदम की प्रशंसा करेगा।

अब हम अपना ध्यान महिलाओं की भूमिका की ओर आकर्षित करते हैं और महिलाओं को विरासत में जो हिस्सा मिल रहा है उसके उपयुक्त होने पर विचार करते हैं।

महिलाओं की भूमिका

यदि हम महिलाओं की समाज में भूमिका पर ध्यान दें तो मालूम होगा कि इस्लाम और कुरान ने उन्हें जो कुछ दिया था वह अन्यायपूर्ण नहीं था ।

यह उनकी वित्तीय और आर्थिक जिम्मेदारियों के तार्किक रूप से अनुरूप है, क्योंकि उनकी जिम्मेदारियां पुरुष वारिसों की तुलना में बहुत कम हैं ।

इस्लाम परिवार को चलाने और उसका खर्च उठाने की जिम्मेदारी पुरुष पर डालता है। यह पुरुषों की जिम्मेदारी है कि वह अपनी पत्नियों, बच्चों और माता-पिता की देखभाल करें ।

यह वही लोग हैं जो उन्हें खाना, कपड़ा और घर देते हैं, उन्हें शिक्षा देते हैं और उनका विवाह भी करते हैं । अतः महिलाओं को वास्तविक जीवन के खर्चों से पुरुषों की तुलना में मुक्त रखा गया है।

इन परिस्थितियों में यदि वह अपने पुरुष रिश्तेदारों की तुलना में यदि आधा पाती हैं तो इसे उनके उपयुक्त हिस्से से अधिक समझा जाना चाहिए और इसे उपयुक्त रूप से न्याय कहा जाना चाहिए ।

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अतः जब हम महिलाओं की अनेक भूमिकाओं पर दृष्टि डालते हैं, तो वह बेटी के रूप में बाप की देखभाल में होती हैं, पत्नी के रूप में अपने पति की देखभाल में रहती हैं और माँ के रूप में अपने बेटों की देखभाल में होती हैं, अतः उनकी आर्थिक जिम्मेदारियाँ शून्य होती हैं । उनको जो कुछ प्राप्त करने का अधिकार दिया गया है वह उनके लिए काफी है।

अतः लिंग के आधार पर भेदभाव के आरोप में कोई वजन नहीं है। इससे स्पष्ट होता है कि इस्लाम स्त्रियों और पुरुषों के बीच उनके धार्मिक दायित्वों और अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करना चाहता था ।

पुरुष अपनी संपत्ति महिलाओं और अपने बच्चों पर खर्च करने के लिए बाध्य होते हैं जबकि महिलाएँ अपनी संपत्ति को बचा कती हैं, निवेश कर सकती हैं। संपत्ति में हिस्से के अतिरिक्त पुरुषों से कहा गया है कि वह विवाह के समय अपनी पत्नियों को महर अदा करें।

मान लीजिए कि कोई एक बेटा और एक बेटी छोड़कर मर जाता है। जब बेटा अपनी पत्नी को महर देगा तो उसकी विरासत में पायी हुई संपत्ति कम हो जाएगी क्योंकि वह अपने परिवार और बहन पर खर्च करता रहेगा जब तक कि उसका विवाह नहीं हो जाता ।

अतः उसे काम करके अतिरिक्त आय कमानी होगी। जबकि उसकी बहन का हिस्सा पूरी तरह बचा रहेगा और अगर वह निवेश कर देती है तो वह बढ़ भी जाएगा ।

जब उसका विवाह होगा तो वह अपने पति से महर प्राप्त करेगी और उसका पति उसका खर्च भी चलाएगा और उसके ऊपर कोई आर्थिक जिम्मेदारी नहीं होगी । इस प्रकार कोई पुरुष यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि इस्लाम ने पुरुषों की तुलना में महिला का पक्ष लिया है।

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