मुसलमान रमजान क्यों मनाते है – रमज़ान पर्व और रोज़ो के बारे में आप क्या जानते हैं – रमजान का हिंदी अर्थ

रमजान का हिंदी अर्थ : रमज़ान (Ramadan या Ramazan) इस्लामी कलैण्डर का 9वाँ महीना है। पूरी दुनिया के मुसलमान इसे रोज़े के महीने के रूप में मनाते हैं । इस वार्षिक अनुष्ठान को इस्लाम के पाँच स्तम्भों में से एक माना जाता है।

हदीस में संग्रह किए हुए पैगम्बर (सल्ल0) के जीवनी के अनेक विवरणों के आधार पर यह महीना, चाँद दिखायी देने के आधार पर 29 या 30  दिन का होता है।

रमज़ान

रोज़ा (Fasting in Islam) क्यों रखा जाता है

अल्लाह ने मुसलमानों पर रोज़े अनिवार्य किए हैं। जिस प्रकार उसने इससे पहले की कौमों पर अनिवार्य किया था । अल्लाह तआला कुरआन में फ्रमाता है-

“ऐ ईमान लाने वालो! तुम पर रोज़े अनिवार्य किए गए, जिस प्रकार तुम से पहले के लोगों पर किए गये थे, ताकि तुम डर रखने वाले बन जाओ”

(कुरआन, 2:183)

यदि इसकी शाब्दिक परिभाषा की जाए तो रोजें का अर्थ रमज़ान के पूरे महीनें पूरी तरह खाने, पीने, मैथुन, धूम्रपान और हर तरह की अभद्र गाली-गलौज वाला आक्रामक व्यवहार और सांसारिक उत्तेजनाओं और इच्छाओं से, भोर से लेकर सूर्यास्त तक बचना है।

क्यों रखा जाता है

इस्लाम के अनुसार रोजे के पुरस्कार, लाभ या पुण्य बहुत से हैं। लेकिन इस महीने में इन सबका पुण्य कई गुना बढ़ जाता है। रमज़ान के महीने में मुसलमानों के लिए रोजें में नमाज़ों की संख्या और कुरआन पढ़ने में लगनशीलता बढ़ जाती है।

रोज़ा सभी वयस्क मुसलमानों के लिए अनिवार्य है। सिवाय उन लोगों के जो बीमार है या यात्रा पर है या मासिक धर्म में है कुरआन रोज़े को इबादत का एक रूप बताता है।

चूँकि यह व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों कर्म है इसलिए कुरआन रोज़े के नैतिक और आध्यात्मिक पहलुओं पर बल देता है और बताता है कि इसका उद्देश्य अपनी प्राकृतिक इच्छाओं पर नियन्त्रण करके आत्मनियन्त्रण सीखना है।

जब रोज़ा एक धार्मिक आदेश के रूप में स्थापित हो गया तो पैगम्बर के मदीना शहर में बहुत से मुसलमानों ने सोचा कि रमज़ान के महीने में रात में भी अपनी पत्नीयो के साथ मैथुन हराम है। इसमें एक अतिरिक्त कठोरता थी।

ताकि वह सीधी राह पर आ जाए (मुसलमानों) तुम्हारे वास्ते रोज़ों की रातों में अपनी बीवियों के पास जाना हलाल कर दिया गया औरतें (गोया) तुम्हारी चोली हैं और तुम (गोया उन के दामन हो)

ख़ुदा ने देखा कि तुम (गुनाह) करके अपना नुकसान करते (कि ऑंख बचा के अपनी बीबी के पास चले जाते थे) तो उसने तुम्हारी तौबा क़ुबूल की और तुम्हारी ख़ता से दर गुज़र किया पस तुम अब उनसे हम बिस्तरी करो और (औलाद) जो कुछ ख़ुदा ने तुम्हारे लिए (तक़दीर में) लिख दिया है उसे माँगों और खाओ और पियो यहाँ तक कि सुबह की सफेद धारी (रात की) काली धारी से आसमान पर पूरब की तरफ़ तक तुम्हें साफ नज़र आने लगे फिर रात तक रोज़ा पूरा करो

और हाँ जब तुम मस्ज़िदों में एतेकाफ़ करने बैठो तो उन से (रात को भी) हम बिस्तरी न करो ये ख़ुदा की (मुअय्युन की हुई) हदे हैं तो तुम उनके पास भी न जाना यूँ खुल्लम खुल्ला ख़ुदा अपने एहकाम लोगों के सामने बयान करता है ताकि वह लोग (नाफ़रमानी से) बचें

(देखिए कुरआन 2:187)

कुरआन भूख और प्यास के साथ-साथ मैथुन को भी प्राकृतिक इच्छा घोषित करता है। प्रतिदिन के रोज़ों के बाद जो चीज़ खाने-पीने के मामले में लागू होती थी, वही मैथुन करके लागू हो रही थी।

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अल्लाह चाहता है कि तुम्हारे (मुसलमानों) लिए आसानी हो और तुम्हारे लिए कठिनाई नहीं चाहता, इसमें इशारा उन आरम्भिक मुसलमानों की ओर है जो पूरे महीने इन सम्बन्धों से परहेज करते थे।

यहाँ सन्तुलन का विचार भी है कि आध्यात्मिक तलाश भौतिक इच्छा की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। अल्लाह से निकटता प्राप्त करने के लिए शरीर और आत्मा के बीच सामंजस्य होना चाहिए।

आपसी सन्तुलन का विचार पति और पत्नी के बीच आपसी सम्बन्धों को लिबास की उपमा देने में प्रदर्शित होता है।

जिस प्रकार लिबास किसी के शरीर की रक्षा करता है। उसी तरह दम्पत्ति भी एक-दूसरे की रक्षा करते हैं जिस प्रकार लिबास शरीर को आराम देता है, उसी प्रकार लिबास भी पत्नी-पत्नी के बीच एक-दूसरे के लिए आराम का साधन है।

जिस प्रकार लिबास (परिधान) शरीर को सजाते और सौन्दर्य प्रदान करते हैं । उसी प्रकार विवाह दोनों को एक-दूसरे से पूर्णता प्रदान करता है, एक की कमजोरी दूसरे की ताकत और आपसी सहयोग से दूर हो जाती है। सम्बन्धों में इससे अधिक सौन्दर्य क्या हो सकता है?

कुरआन रमज़ान के रोज़ों का आदेश विशेष कारण से देता हैः यह वह महीना है जब स्वयं कुरआन अवतरित हुआ था।

इस प्रकार मुस्लिम विचारधारा में रमज़ान का कुरआन से बहुत निकट सम्बन्ध है। 

रोज़ा रखने से होने वाले फ़ायदे:

  • यह एक महीने का आध्यात्मिक प्रशिक्षण का कार्यक्रम है ताकि मुसलमान अपने पैदा करने वाले और जीविका देने वाले अल्लाह द्वारा एक मुसलमान पर डाले गए कर्त्तव्यों को पूरा करने के लिए ताजादम हो सकें।
  • यह इंसान को शुद्ध प्रेम के सिद्धान्तों की शिक्षा देता है क्योंकि जब वह रोज़ा रखता है तो वह इसे अपने अल्लाह से गहरे प्रेम के कारण रखता है जो व्यक्ति अल्लाह से प्रेम करता है वह जानता है कि वास्तव में प्रेम है क्या?
  • यह इंसान के अंदर गहरी और जागती हुई चेतना का विकास करता है क्योंकि रोज़ा रखने वाला व्यक्ति अपना रोज़ा तन्हाई में भी रखता है और सावजनिक  रूप से भी। विशेष रूप से रोजें में कोई सांसारिक ताकत ऐसी नहीं होती जो इंसानी व्यवहार की जाँच कर सके या रोज़ा रखने के लिए उसे विवश कर सके । वह अपने अल्लाह को खुश करने के लिए रोजा रखता है और तन्हाई और सार्वजनिक रूप से वफादार रहकर अपनी चेतना को सन्तुष्ट करता है।इन्सान के अन्दर गहरी चेतना विकसित करने का इससे अच्छा तरीका और कोई नहीं हो सकता।
  • रोज़ा आत्म-नियन्त्रण पैदा करता है और अपने स्वार्थ, लालच और आलस्य पर काबू पाने में हमारी सहायता करता है। रोज़ा इंसान को, भूख और प्यास की तकलीफों का अनुभव करने योग्य बनाता है। व्यक्ति यह महसूस करना आरम्भ कर देता है कि गरीबों और अभागे लोगों को इसी तरह भूख लगती होगी, वह लाखों गरीब लोग जो प्रतिदिन भूखे सोते हैं।
  • एक सामान्य इंसानी कमजोरी गुस्सा है- इसे भी रोज़े के माध्यम से नियन्त्रित किया जा सकता है।
  • यह व्यावहारिक सन्तुलन और इच्छा शक्ति विकसित करने की प्रभावशाली शिक्षा है। जो व्यक्ति अपने रोज़े अच्छे ढंग से रखता है, वह निश्चित रूप से ऐसा इंसान है जो अपनी भावुक इच्छाओं को अनुशासित कर सकता है और वह अपने आप को भौतिक लालच से ऊपर रख सकता है। ऐसा व्यक्ति व्यक्तित्व और चरित्र वाला व्यक्ति होता है जिसके अन्दर इच्छा शक्ति और दृढ़ निश्चय की विशेषताएँ होती हैं ।
  • यह इंसान को एक पारदर्शी आत्मा उपलब्ध कराता है ताकि भौतिकता से ऊपर उठ सके और शुद्ध मन उपलब्ध कराता है जो चिन्तन कर सके और हल्का शरीर उपलब्ध कराता है जो गतिशील और सक्रिय हो। इसी तरह जब वह अपने पेट को आराम देता है और अपने पाचन-तन्त्र को सुकून देता है तो वास्तव में वह अपने शरीर को पेट अधिक भरने के कारण जो हानि पहुँचती है उससे बचाव को सुनिश्चित करता है और इसी तरह आत्मा को भी। चिकित्सकीय निर्देश, जैविक नियम और बौद्धिक अनुभव इस तथ्य को प्रमाणित करते हैं ।
  • यह इंसान के अन्दर एकता, भाईचारा और अल्लाह के सामने और कानून के सामने भी सामाजिक लगाव की वास्तविक भावना उभारता है। यह भावना इस वास्तविकता का प्राकृतिक परिणाम है। जब इंसान रोज़ा रखता है तो वह महसूस करता है कि वह एक ही दिन, एक ही ढंग से, एक ही समय में, एक ही उद्देश्य और एक ही मंजिल के लिए रोज़ा रखकर पूरे मुस्लिम समाज के साथ मिल गया है।
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