क्या मुसलमान पैगम्बर मुहम्मद की पूजा (इबादत) करते हैं – मुसलमान या मुहम्मडन

मुसलमान किसी भी तरह पैगम्बर मुहम्मद (उनके ऊपर अल्लाह की दया और कृपा हो) की इबादत नहीं करते । मुसलमानों का विश्वास है कि वह सर्वशक्तिमान अल्लाह द्वारा भेजे हुए अंतिम पैगम्बर थे और अन्य पैगम्बरों की तरह वह भी मनुष्य थे ।

तथापि कुछ लोग गलती से यह मानते हैं कि मुसलमान (अल्लाह की पनाह) मुहम्मद की इबादत करते हैं और यही कारण है कि मुसलमानों को गलती से मुहम्मडन कहा जाता है।

ईसा मसीह की तरह पैगम्बर मुहम्मद (उनके ऊपर अल्लाह की दया और कृपा हो) ने भी अपने लिए दैवीय स्थान का दावा नहीं किया । उन्होंने लोगों को केवल एक अल्लाह की इबादत की ओर बुलाया और वह लगातार अपने मनुष्य होने पर जोर देते रहे।

या मुहम्मदवाद

अपने आप को देवता बनाने से बचने के लिए पैगम्बर मुहम्मद (उनके ऊपर अल्लाह की दया और कृपा हो) ने कहा कि उन्हें सदैव “अल्लाह का बंदा और पैगम्बर कहकर पुकारा जाए ।” आपने कहा: “मेरी प्रशंसा इस तरह न करो जिस तरह ईसाइयों ने ईसा बिन मरियम की प्रशंसा की (और उन्होंने उन्हें अल्लाह का बेटा बना दिया) । मैं अल्लाह का बंदा और उसका पैगम्बर हूँ ।”

मुहम्मद (उनके ऊपर अल्लाह की दया और कृपा हो) को अल्लाह के अन्तिम पैगम्बर के रूप में अल्लाह के सन्देश को पूरी मानवता तक पहुँचाने के लिए चुना गया था।

आपको केवल शब्द पहुँचाने के लिए नहीं कहा गया था, बल्कि उन शब्दों के व्यावहारिक प्रयोग का जीवंत उदाहरण बनने के लिए भी भेजा गया था ।

मुसलमान उनके महान नैतिक चरित्र के कारण उनसे प्यार करते और उनका सम्मान करते हैं और इसलिए भी कि उन्होंने अल्लाह द्वारा दी गयी सच्चाई को हम तक पहुँचा दिया जो इस्लाम का विशुद्ध एकत्ववाद (तौहीद) है।

मुसलमान पैगम्बर मुहम्मद (उनके ऊपर अल्लाह की दया और कृपा हो) का महान आदर्श अपनाने का प्रयास करते हैं। परन्तु वह किसी तरह उनकी पूजा नहीं करते ।

इस्लाम मुसलमानों को शिक्षा देता है कि वह सभी पैगम्बरों का सम्मान करें। उनका सम्मान करने और उनसे प्रेम करने का अर्थ उनकी पूजा करना नहीं है। मुसलमान जानते हैं कि सभी इबादतें केवल अल्लाह के लिए ही होती हैं।

इस्लाम धर्म में अल्लाह के साथ या अल्लाह के अतिरिक्त पैगम्बर मुहम्मद (उनके ऊपर अल्लाह की दया और कृपा हो) की इबादत भी वास्तव में अक्षम्य पाप है ।

यद्यपि कोई मुसलमान, मुसलमान होने का दावा करता हो, परन्तु वह अल्लाह के अतिरिक्त किसी और की इबादत करता हो तो इससे उसके इस्लाम का दावा अवैध हो जाता है।

ईमान लाने की घोषणा करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि मुसलमानों को केवल एक अल्लाह की इबादत करनी चाहिए ।

इस्लाम और मुस्लिम ऐसे शब्द हैं जिनका प्रयोग कुरान  में किया गया है । अल्लाह तआला फ्रमाता है, “निश्चय ही अल्लाह के लिए स्वीकार्य जीवन पद्धति इस्लाम है” (कुरान , 3:19) “उसने तुम्हारा नाम मुस्लिम रखा था और इस कुरान में भी मुस्लिम ही रखा है।” (कुरान , 22:78)

आदम से लेकर मोहम्मद तक सभी पैगम्बरों का सन्देश एक ही रहा है: अल्लाह का आज्ञापालन करो और किसी अन्य का नहीं । पैगम्बरों द्वारा भेजा गया यह सन्देश पैगम्बर मुहम्मद (उनके ऊपर अल्लाह की दया और कृपा हो) पर पूरा हुआ जो पैगम्बरों की श्रृंखला के अंतिम पैगम्बर थे ।

यह बात कुरान में लिखी हुई है: “आज के दिन मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारे धर्म को पूरा कर दिया, मैंने तुम्हारे ऊपर अपना उपकार पूरा कर दिया । और इस्लाम को तुम्हारी जीवन व्यवस्था के रूप में चुन लिया ।” (कुरान , 5:3)

अतः इस्लाम को मुहम्मदवाद (Muhammadanism – मुहम्मडनिज्म) और मुसलमानों को मुहम्मडन कहना ग़लत है और मुहम्मद को इस्लाम का संस्थापक कहने के बजाए मुहम्मद को इस्लाम के अन्तिम पैगम्बर के रूप में देखना चाहिए ।

Leave a Reply