क्या मुस्लिम आबादी में वृद्धि वास्तव में भयानक है – क्या मुसलमान आबादी के लिए ज़िम्मेदार है

एक भ्रान्ति यह है कि आबादी में वृद्धि की दर मुसलमानों में अधिक है, वे चार विवाह करते हैं और जल्द ही उनकी जनसंख्या हिंदुओं की जनसंख्या से अधिक हो जाएगी और यह देश एक मुस्लिम बहुल देश बन जाएगा ।

कुछ लोग कहते हैं कि मुसलमान परिवार नियोजन के उपाय नहीं करते और अपनी जनसंख्या बढ़ाने के लिए अनेक विवाह करते हैं।

सच्चाई यह है कि प्रभावशाली साम्प्रदायिक शक्तियों ने पिछले वर्षों में इस झूठ का प्रचार किया है । साम्प्रदायिक शक्तियों ने मुस्लिम आबादी में वृद्धि की दर के भय को बढ़ा चढ़ा कर फैलाया है ताकि वह अपने बहुसंख्यक वोटों को एकत्र कर सकें। 

और इसके लिए उन्होंने आधे-अधूरे सच को तोड़-मरोड़ कर और अफवाह फैलाने की तकनीकों के द्वारा इन मिथकों को जनता के मन में प्रभावपूर्ण ढंग से बैठा दिया है, के आधार पर किए गए सर्वेक्षण इस सामान्य भ्रान्ति को पूर्ण रूप से नकारता हैं।

आबादी का राक्षस

इन सर्वेक्षणों में धर्म को एक मार्कर के रूप में प्रयोग किया गया है । सन्‌ 1971 के सर्वे के अनुसार हिंदुओं की जनसंख्या 82.6 प्रतिशत और मुसलमानों की जनसंख्या 11.2 प्रतिशत थी ।

सन्‌ 1991 की जनगणना में ये आंकड़े हिन्दुओं के लिए 82.0 प्रतिशत और मुसलमानों के लिए 11.4 प्रतिशत थे। (मलयालम मनोरमा, 1992) ।

मुसलमानों की आबादी की वृद्धि दर केवल थोड़ी ही अधिक है अर्थात 2.7 प्रतिशत प्रतिवर्ष है । जबकि हिन्दुओं की आबादी की वृद्धि दर 2001 की जनगणना के अनुसार 2.3 प्रतिशत है।

लेकिन इसका कारण यह है कि मुसलमानों की सामाजिक आर्थिक दशा निम्न है और निरक्षरता भी अधिक है। समान सामाजिक और आर्थिक दशा वाले मुसलमानों और हिन्दुओं के बीच जनसंख्या वृद्धि दर समान है । इस सन्दर्भ में केरल एक उदाहरण है।

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जहाँ तीनों बड़े समुदाय हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई की वृद्धि दर 1.8 प्रतिशत भारतीय मुसलमानों के बीच किए गए सर्वेक्षण के नतीजे दर्शाते हैं कि विभिन्न सरकारों ने विभिन्न आयोगों द्वारा दिए गए परामर्शों पर या जो कम ध्यान दिया या उन परामर्शों को सुना ही नहीं और उन्होंने इन आयोगों को केवल वोट प्राप्त करने की चाल के तौर पर प्रयोग किया ताकि वह मुसलमानों को यह आभास दिला सकें कि वह मुसलमानों के पिछड़ेपन के बारे में गंभीर हैं ।

लेकिन वास्तव में वे करते कुछ नहीं हैं । क्योंकि यहाँ तीनों समुदायों में साक्षरता की दर भी समान है। इसके विपरीत जम्मू और कश्मीर में हिन्दुओं की आबादी में वृद्धि मुसलमानों से अधिक है। हिन्दुओं की वृद्धि दर 3.7 प्रतिशत है जबकि मुसलमानों की वृद्धि दर 2.6 प्रतिशत है।

कुल मिलाकर यह आंकड़े दर्शाते हैं कि धर्म के आधार पर आबादी की वृद्धि दर समान है। इसके अतिरिक्त, यद्यपि इस समय वृद्धि दर में अन्तर जारी भी रहता है तब भी अगली सदी तक भी मुसलमानों की आबादी हिंदुओं की तुलना में अधिक होने की संभावना नहीं है ।

इसके विपरीत यदि मौजूदा वृद्धि दर का विश्लेषण किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि सन्‌ 1961-71 और सन्‌ 1971-81 के बीच हिन्दू आबादी में वृद्धि 23.71 प्रतिशत से 24.42 प्रतिशत हो गयी।

जबकि उसी अवधि के दौरान मुस्लिम आबादी में वृद्धि की दर 30.80 प्रतिशत से घटकर 30.20 प्रतिशत हो गयी । यदि ये वृद्धि दरें एक ही स्तर पर स्थिर हो जाएं तो 1981 से लेकर 100 वर्षों तक हिन्दू और मुसलमान दशकीय वृद्धि दर क्रमश 30.71 प्रतिशत और 30.55 प्रतिशत दर्ज करेंगे, अर्थात हिन्दुओं की वृद्धि दर मुसलमानों की तुलना में अधिक होगी ।

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क्या भारत में मुसलमानों की संख्या हिंदुओं से ज्यादा होगी?

Dr S. Y. Quraishi Book Link “The Population Myth: Islam, Family Planning and Politics in India

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