मदरसा शिक्षा व्यवस्था – मकतब और मदरसा में क्या अंतर है

भारत में मदरसे उन लोगों की आलोचना का निशाना बने हैं, जो लोग राजनीतिक स्वार्थ रखते हैं और मीडिया के एक वर्ग की ओर से भी, जो भेदभाव पूर्ण दृष्टिकोण रखता है।

मदरसों के बारे में अपना दृष्टिकोण वह लोग व्यक्त करते हैं जिनको मुश्किल से ही मदरसा व्यवस्था के बारे में और जो कुछ वहाँ पढ़ाया जाता है, उसके बारे में स्वयं सीधी जानकारी रखते हैं।

उन्होंने केवल यह मान लिया है कि चूँकि ये इस्लामी संस्थाएँ हैं इसलिए अवश्य जिहाद और युद्ध की शिक्षा देती होंगी । यहाँ तक कि जब एन.डी.ए. सत्ता में थी तो उसके जिम्मेदार मंत्रियों ने भी ऐसे वक्तव्य दिए थे। अतः सही जानकारी और उपयुक्त अध्ययन के बाद ही अपना दृष्टिकोण प्रकट करना चाहिए।

इस्लाम अपने उदय के साथ ही भारत में प्रवेश कर चुका था, कुछ लोगों का मानना है कि इस्लाम, पैगम्बर के जीवनकाल में ही केरल के रास्ते दक्षिण भारत में आ चुका था और एक सदी बाद उत्तर भारत में सिन्ध के रास्ते आया ।

उत्तर और दक्षिण दोनों दिशाओं में सैकड़ों लोगों ने इस्लाम धर्म स्वीकार किया और इस तरह आरम्भ से ही यहाँ धर्म को पढ़ाने और उलमा तैयार करने के लिए मदरसों की आवश्यकता पड़ी ताकि वह दूसरों को पढ़ा सकें और नमाज़ पढ़ने और अन्य धार्मिक कर्त्तव्यों के निर्वाह में लोगों की मदद कर सकें ।

मदरसा क्या है

शाब्दिक रूप से मदरसा उस स्थान को कहते हैं जहाँ पर शिक्षा और अध्ययन कार्य होता है। मदरसा हिन्दी के शब्द विद्यालय या अंग्रेजी के शब्द स्कूल की तरह है।

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अंग्रेजी और हिन्दी में स्कूल और विद्यालय प्राथमिक शिक्षा और पूर्व माध्यमिक स्तर के होते हैं लेकिन उर्दू में मदरसा का तात्पर्य प्राथमिक शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालय स्तर तक की शिक्षा देने वाली संस्था से है ।

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इस्लामी देशों में उच्च शिक्षा के केन्द्रों को भी मदरसा कहा जाता है। कोलकाता में एक मदरसा आलिया अर्थात उच्च शिक्षा विद्यालय है जिसे अब पश्चिम बंगाल सरकार ने विश्वविद्यालय का दर्जा दे दिया है।

यह जानकारी उल्लेखनीय है कि ये मदरसे दूसरे सम्प्रदायों के छात्रों के लिए भी खुले हुए हैं । राजा राममोहन राय ने मदरसा आलिया में पढ़ा था और वह फारसी और अरबी के उसी तरह विद्वान थे जिस तरह वह संस्कृत और हिन्दू धर्म के विद्वान थे ।

बहुत से मामलों में ये मदरसे धार्मिक और अधार्मिक दोनों ही आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे और ये सांसारिक और धार्मिक दोनों प्रकार के जीवन के लिए आवश्यक थे।

आज लगभग 20,000 मदरसे प्रतिवर्ष 1.5 मिलियन छात्रों को शिक्षा देते हैं। सच्चर कमेटी रिपोर्ट (2006) के अनुसार लगभग 4 प्रतिशत मुस्लिम बच्चे मदरसों में जाते हैं ।

जो बात महत्वपूर्ण है वह यह है कि मदरसा अब भी गरीब, देहाती और कुछ सीमा तक शहरी मुसलमानों के लिए महत्वपूर्ण संस्था है।

हिन्दुस्तान में मुसलमानों की एक बड़ी संख्या निर्धन और अशिक्षित है। ये गरीब मुसलमान यदि चाहें भी तो अपने बच्चों को सेक्युलर शिक्षा संस्थाओं में भेजने की क्षमता नहीं रखते ।

इसके अतिरिक्त उनकी कुछ धार्मिक आवश्यकताएँ होती हैं और मदरसे केवल धार्मिक आवश्यकताओं की ही पूर्ति नहीं करते, बल्कि वह निःशुल्क शिक्षा, खाना और छात्रावास की सुविधा प्रदान करते हैं और इससे बढ़कर ये ऐसे स्थान पर स्थित होते हैं जो बच्चों के लिए सुविधाजनक होते हैं।

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हमें सभी मदरसों को एक जैसा समझना भी नहीं चाहिए । उन्हें विभिन्न वर्गों में बांटकर देखने की आवश्यकता है । उदाहरण के लिए प्रारंभिक मदरसों में जिन्हें मकतब कहा जाता है मात्र प्रारम्भिक धार्मिक शिक्षाएँ ही दी जाती हैं ।

इसके बाद माध्यमिक स्तर के मदरसे आते हैं जहाँ अरबी भाषा, कुरान, कुरान की व्याख्या और हदीस आदि विषय पढ़ाए जाते हैं । इसके बाद उच्च स्तर के मदरसे आते हैं जिनकी तुलना स्नातक या स्नातकोत्तर स्तर की पढ़ाई से की जा सकती है । कॉलेजों के उद्भव के साथ-साथ जामिया अथवा विश्वविद्यालयों का विकास हुआ ।

संसार का सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय मोरक्को के फेज नगर में स्थित कराविईन विश्वविद्यालय है जिसकी स्थापना 859 ई0 में हुई थी ।

फिर इसके बाद जल्द ही मिस्र की राजधानी काहिरा में अल-अजहर विश्वविद्यालय की स्थापना 970 ई0 में हुई। विश्वविद्यालय के छात्र धार्मिक विद्याओं के अतिरिक्त तर्कशास्त्र, आध्यात्म, दर्शन, गणित, भौतिक विज्ञान, खगोल विज्ञान, भाषण शैली और यन्त्र निर्माण की शिक्षा प्राप्त करते थे।

मुसलमानों द्वारा मदरसा शिक्षा को अधिक महत्व देने के कारण निम्नलिखित हैं:

  • मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में आधुनिक स्कूलों की कमी ।
  • अलग बालिका विद्यालयों की कमी और यहाँ तक कि सह-शिक्षा वाले स्कूलों में महिला शिक्षकों की कमी ।
  • आधुनिक शिक्षा का मँँहगा होना और सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता का निम्न होना।
  • सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की खराब स्थिति ।
  • “रिवायती मुसलमानों की उपयुक्त शिकायत यह है कि स्कूल की पाठ्य पुस्तकों की सामग्री में हिन्दू भेद-भाव मौजूद है ।”

मदरसों के आधुनिकीकरण का एक आंदोलन चल रहा है और बहुत से मदरसों ने अपने आधुनिकीकरण का का काम प्रारम्भ कर दिया है।

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अभी पिछले दिनों एक मुख्य सरकारी संस्था एन.सी.ई.आर.टी. (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद) ने एक अध्ययन कराया जिससे पता चला कि अनेक राज्यों, विशेष रूप से केरल और पश्चिम बंगाल में मदरसों में शिक्षा सामग्री में संतुलन पैदा करने की प्रक्रिया जारी है । इस अध्ययन में मदरसा की पाठूय सामग्री में कोई राष्ट्र विरोधी तत्व नहीं मिल सका ।

मकतब और मदरसा में क्या अंतर है

इस ग़लतफहमी का कि अधिकतर मुस्लिम बच्चे मदरसों में जाते हैं एक कारण यह है कि लोग मदरसा और मकतब में भेद नहीं जानते ।

यद्यपि मदरसे नियमित शिक्षा देते हैं, मकतब मोहल्ला की मस्जिद से जुड़े स्कूल होते हैं जो अन्य स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को धार्मिक शिक्षा देते है । इस तरह मकतब औपचारिक शिक्षा संस्थाओं में पढ़ने वाले बच्चों को धार्मिक शिक्षा देते हैं, इस तरह वे इन संस्थाओं के पूरक होते हैं।

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