इस्लाम और पुरोहितवाद

कुछ लोगों की प्रवृत्ति है कि वह इमाम, मुफ्ती, काज़ी या मौलवी के पद को पुरोहितवाद के रूप में देखते हैं। एक इमाम केवल नमाज का नेतृत्व करता है और मुफ्ती धार्मिक मामलों से सम्बन्धित किसी प्रश्न के सम्बन्ध में अपने धार्मिक ज्ञान के आधार पर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

काज़ी न्यायालय का मुखिया होता है और वह विवादों का निपटारा करता है। जबकि मौलवी एक धार्मिक विद्वान होता है जो कुरान पढ़ता और पढ़ाता है।

और पुरोहितवाद

इनमें से किसी को कोई दैवीय स्थान प्राप्त नहीं है । इन्हें अल्लाह और मनुष्य के बीच का दलाल या मध्यस्थ नहीं समझा जाता ।

किसी इमाम के सामने अपना पाप स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं होती । व्यक्ति अल्लाह के सामने दुआ करके अपने पापों की क्षमा माँग सकता है ।

कोई भी व्यक्ति जिसने कुरान का कुछ भाग याद कर लिया हो और व्यावहारिक रूप से इस्लाम का पालन करने वाला प्रतीत हो रहा हो वह मस्जिद में नमाज़ की इमामत कर सकता है।

घरेलू कर्म-काण्डों और समारोहों जैसे सुन्नत, मकतब, फातिहा या घर या व्यवसाय के उद्घाटन के लिए किसी धार्मिक नेता को बुलाने की आवश्यकता नहीं होती ।

मस्जिद में किसी के लिए कोई स्थान सुरक्षित नहीं होता । मस्जिद में स्थान पहले आया पहले पाया’ के आधार पर मिलते हैं । इस्लाम में कोई प्रतिष्ठावाद नहीं है ।

सभी लोग एक ही स्तर पर खड़े होते हैं, और एक ही थाली में खाते हैं । कुरान का यह आदेश मन में रखना उपयोगी हैः

“अल्लाह की दृष्टि में तुम में सर्वाधिक प्रतिष्ठित वह है जो सबसे अधिक अल्लाह से डरने वाला है”

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