इस्लाम औरतों को पर्दे में रखकर उनका अपमान क्यों करता है?

इस्लाम और औरत का पर्दा [Islam and Hijab]

आज मुस्लिम महिला की सबसे अधिक आलोचना उसके पहनावे के सिलसिले में की जाती है। आज बहुत से लोगों के मन में महिलाओं की स्वतन्त्रता अथवा महिला मुक्ति उसका कपड़ा कम करने में देखते हैं।

यदि कोई महिला कम से कम कपड़ा पहनती है और अपने शरीर का जितना अधिक प्रदर्शित करती है उतना ही अधिक स्वतन्त् समझी जाती है।

Islam and Hijab

हालौँकि प्राचीन समाजों की दलित महिलाओं को अपने शरीर को हर संभव समाज में प्रदर्शित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था और यदि वह ऐसा नहीं करतीं तो उनपर दबाब डाला जाता था ।

वास्तव में यह उनके लिए स्वतन्त्रता का प्रतिनिधित्व अथवा अधिकारों की प्राप्ति नहीं थी । बल्कि इसे उनके चारों ओर रहने वाले पुरुषों की कामुक इच्छाओं की प्राप्ति समझा जाता था और जो कामुकतापूर्वक महिलाओं के शरीर पर उसी तरह टकटकी लगाते थे जिस तरह से आजकल के पुरुष उनके शरीर को देखते हैं।

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Hijab (पर्दा) क्या होता है

कुरआन में पर्दे के सम्बन्ध में जिस शब्दावली का प्रयोग किया जाता है वह “हिजाब” है। हिजाब का शाब्दिक अर्थ पर्दा, विभाजक, या स्क्रीन है।

Hijab (हिजाब) का जिस अर्थ में परम्परागत रूप से प्रयोग किया जाता है और जिसे मुस्लिम समाज में समझा जाता है, वह कपड़े का एक ऐसा टुकड़ा है जो सिर और पूरे शरीर को ढांकता है।

महिलाओं के सतीत्व और सम्मान की रक्षा के लिए और एक पवित्र समाज विकसित करने के लिए यह आदेश दिया गया है कि महिलाएँ ठीला परिधान पहनें ।

Hijab क्या होता है

भारतीय उपमहादवीप में मुस्लिम महिला को सिर से पैर तक ढौँकने वाला कपड़ा ‘बुर्का’ कहा जाता है ।

मध्य-पूर्व में इसे ‘निकाब’ कहा जाता है, ईरान में पूरा शरीर ढंकने वाली काली चादर होती है और अरब देशों में जिस पर्दे को मुस्लिम महिला प्रयोग करती हैं उसे ‘अबाया’ कहा जाता है।

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विश्व के अन्य देशों में इसे स्कार्फ कहा जाता है, जिससे मुस्लिम महिलाएँ अपने सिर को टौँकती हैं।

इस्लाम से पूर्व समाज में स्त्रियों को स्थिति

इस्लाम में औरतों की जो स्थिति है, उसपर सेक्यूलर मीडिया का ज़बरदस्त हमला होता है। वे पर्दे और इस्लामी लिवास को इस्लामी क्रानून में स्त्रियों की दासता की मिसाल के रूप में पेश करते हैं।

इससे पहले कि हम पर्दे के धार्मिक निर्देश के पीछे मौजूद कारणों पर विचार करें, इस्लाम से पूर्व समाज में स्त्रियों को स्थिति का अध्ययन करते हैं।

भूतकाल में स्त्रियों का अपमान किया जाता और उनका प्रयोग केवल काम-वासना के लिए किया जाता था

इतिहास से लिए निम्न उदाहरण इस तथ्य की पूर्ण रूप से व्याख्या करते हैं कि आदिकाल की सभ्यता में औरतों का स्थान इस सीमा तक गिरा हुआ था कि उनको प्राथमिक मानव सम्मान तक नहीं दिया जाता था।

बेबिलोनिया सभ्यता

औरतें अपमानित की जातीं और वेबिलोनिया के कानून में उनको हर हक़ और अधिकार से वंचित रखा जाता था।

यदि एक व्यक्ति किसी औरत की हत्या कर देता तो उसको दंड देने के बजाय उसकी पत्नी को मौत के घाट उतार दिया जाता था।

यूनानी सभ्यता

इस सभ्यता को प्राचीन सभ्यताओं में अत्यन्त श्रेष्ठ माना की है। इस अत्यंत श्रेष्ठ व्यवस्था के अनुसार औरतों को सभी अधिकारों से वंचित रखा जाता था और वे नीच वस्तु के रूप में देखी जाती थीं।

यूनानी लोग स्त्रियों को पुरुषों के मुक़ावले में तुच्छ जाति मानते थे। यद्यपि उनकी पवित्रता अमूल्य थी और उनका सम्मान किया जाता था, परंतु बाद में यूनानी लोग अहंकार और काम-वासना में लिप्त हो गए। वैश्यावृति यूनानी समाज के हर वर्ग में एक आम रिवाज वन गई।

रोमन सभ्यता

जब रोमन सभ्यता अपने गौरव की चरमसीमा पर थी, उस समय एक पुरुष को अपनी पत्नी का जीवन छीनने का भी अधिकार था | वैश्यायृति और नग्नता रोमवासियों में आम थी।

मिस्री सभ्यता

मिस्री लोग स्त्रियों को शैतान का रूप मानते थे।

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इस्लाम से पहले का अरब

इस्लाम से पहले अरब में औरतों को नीच माना जाता और जब कभी किसी लड़की का जन्म होता तो आमतौर से उसे जीवित दफ़न कर दिया जाता था।

इस्लाम ने औरतों को ऊपर उठाया

इस्लाम ने औरतों को ऊपर उठाया और उनको बराबरी का दर्जा दिया। लगभग 1400 साल पहले ही उनके अधिकार उनको दे दिए और वह उनसे अपेक्षा करता है कि वे अपने स्तर को बनाए रखेंगी ।

पुरुषों के लिए पर्दा

आमतौर पर लोग यह समझते हैं कि पर्दे का संबंध केवल स्त्रियों से हैं। हालांकि पवित्र कुरआन में अल्लाह ने औरतों से पहले मर्दों के पर्दे का वर्णन किया है –

“ईमानवालों से कह दो कि वे अपनी नज़रें नीची रखें और अपनी पाकदामिनी की सुरक्षा करें। यह उनको अधिक पवित्र बनाएगा और अल्लाह ख़ूब परिचित है हर उस कार्य से जो वे करते हैं।”

(कुरआन, 24:30)

स्त्रियों के लिए पर्दा

कुरआन की सूरा निसा में कहा गया है –

“और अल्लाह पर ईमान रखनेवाली औरतों से कह दो कि वे अपनी नज़रें नीची रखें और अपनी पाकदामिनी की सुरक्षा करें और वे अपने बनाव-शरंगार और आभूषणों को न दिखाएँ, इसमें कोई आपत्ति नहीं जो सामान्य रूप से नज़र आता है और उन्हें चाहिए कि वे अपने सीनों पर ओढ़नियाँ ओढ़ लें और अपने पतियों, बापों, अपने बेटों के अतिरिक्त किसी के सामने अपने- बनाव-श्रंगार प्रकट न करे!”

(कुरआन, 24:31)

पर्दा दुर्व्यवहार से रोकता है

पर्दे का औरतों को क्यों उपदेश दिया जाता है इसके कारण का पवित्र कुरआन की सूरा अल अहज़ाब में उल्लेख किया गया है –

“ऐ नबी! अपनी पत्नियों, पुत्रियों और ईमानवाली स्त्रियों से कह दो कि वे (जब बाहर जाएँ) तो ऊपरी वस्त्र से स्वयं को ढॉक लें। यह अत्यन्त आसान है कि वे इसी प्रकार जानी जाएँ और दुर्व्यवहार से सुरक्षित रहें और अल्लाह तो बड़ा क्षेमाकारी और बड़ा ही दयालु है।”

(कुरआन, 33:59)

पवित्र कुरआन कहता है कि औरतों को पर्दे का इसलिए उपदेश दिया गया है कि वे पाक दामन के रूप में देखी जाएँ और पर्दा उनसे दुर्व्यवहार को भी रोकतां है।

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पर्दा/हिजाब पिछड़ेपन का प्रतीक नहीं

यमन की महिला कार्यकर्ता और 2011 की नोबल पुरस्कार विजेता तवक्कुल कारमेन से अधिक शायद उस सम्मान को मूर्त रूप नहीं दिया जो महिलाओं को इस्लाम में प्राप्त हैं ।

उन्होंने नार्वे की राजधानी ओस्लो के सिटी हॉल में नोवल पुरस्कार समारोह में अबाया और स्काफ॑ पहनकर मंच पर आकर अन्तराष्ट्रीय समाचार पत्रों और इलेक्ट्रानिक मीडिया को चकित कर दिया ।

उन्होंने उनसे पूछा: “क्या वह महसूस नहीं करतीं कि उनका परिघान उनकी शिक्षा और बौद्धिक स्तर को देखते हुए उसके विपरीत है ।

क्योंकि हिजाव को मदिलाओं के दमन और पिछड़ेपन के प्रतीक के रूप में देखा जाता है?”

Islam and Hijab

तवक्कुल कारमेन ने उत्तर दिया: “प्रारम्भ में मनुष्य लगभग नग्न रहता था, समय के साथ अपने चिन्तन के विकास के साथ उसने कपड़े पहनना प्रारम्भ किया ।

आज मैं जो कुछ हूँ और जो कुछ मैंने पहना है वह बुद्धि और सुविग्यता का शिखर है जिस पर मनुष्य युगों की यात्रा के बाद पहुँचा है, यह पिछड़ापन नहीं है।

नग्नता पिछड़ेपन का प्रताक है और इस वात का प्रतीक है कि मनुष्य का चिन्तन आदिकाल की ओर पीछे चला गया है।

सारांश

हिजाब या बुर्का मुस्लिम महिला का व्यक्तिगत चुनाव है और दूसरों को इसका सम्मान करना चाहिए । अन्य धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यवसायिक प्रतीकों या परिधानों जैसे ईसाई ननों का परिधान, पास्टर का रोब, डाक्टर का ऐपरन, न्यायाधीश और वकीलों की काली कोट, पगड़ी, टोपी, क्रॉस बने हुए लॉकेट आदि को सहन ही नहीं किया जाता है बल्कि उनका सम्मान भी किया जाता है।

बुर्का उस परिधान से अलग नहीं है जो ईसाई नन पहनती हैं, तो इस्लामी हिजाब के मामले में और शालीनता के सिद्धान्तों के मामले में ही दोहरा मानदण्ड क्यों अपनाया जाता है।

सहनशील होने का अर्थ केवल यह नहीं है कि ऐसे ही लोगों को स्वीकार किया जाए जो पूर्ण रूप से उसी जैसे दिखायी दे रहे हों बल्कि अन्य लोगों की पसन्द को स्वीकार करना सहनशीलता है। विशेष रूप से उस समय जब आप उनसे न सहमत हों और न उन्हें समझ रहे हों।

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