इस्लाम और दरगाहों का दर्शन – दरगाह और मस्जिद के बीच का अंतर

कुछ मुसलमान जो दरगाहों के दर्शन करने जाते हैं अधिकतर इस्लाम का गलत प्रतिनिधित्व करते हैं । इस्लाम, पूर्ण रूप से एकेश्वरवादी धर्म है, एकेश्वरवाद का अर्थ केवल एक सर्वोच्च प्रभु में विश्वास करना है ।

यह बिगाड़ मुसलमानों में दक्षिण एशियाई देशों में आया, जहाँ सूफियों, संतों और दरवेशों की कब्रों पर दरगाहें बनाई गयी । इन संतों ने अपने जीवन के दौरान लाखों लोगों का प्यार और सम्मान अर्जित किया था क्योंकि वह लोग समाज सेवा के लिए समर्पित थे

वे लोग प्यार और सदूभाव के उपदेशक थे और पूर्ण रूप से निस्वार्थ भावना से सेवा करते थे । लेकिन जनता का जो प्यार उन्होंने प्राप्त किया था वह धीरे-धीरे जल्द ही श्रद्धा और स्नेह में बदल गया । बाद में यह एक तरह से उनकी पूजा में परिवर्तित हो गया।

और दरगाहों का दर्शन

मृतक कुछ समूहों के आराध्य बन गये । उनके व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द कथाएं और लोक कथाएँ बनती चली गयी और उनको महामानव की उपाधियों और दैवीय शक्तियों से अलंकृत कर दिया गया ।

लोगों का एक विशेष समूह, जिनको समान हित आपस में जोड़ते थे, उनकी छवि का लाभ उठाने लगे और लगभग उन्हें ऊपर उठाकर उपदेवता बना दिया ।

इस्लाम के साधारण विश्वास में जो ये परम्पराएँ पैदा हो गई वह स्वयं इस बात का प्रमाण हैं कि कुछ आस्थाएँ और विचारधाराएँ पहले की तरह शुद्ध रह सकती हैं।

जबकि उनके संस्थापक बहुत पहले दुनिया से जा चुके हों । कब्रो की इबादत आज भारतीय उपमहाद्वीप में सांस्कृतिक इस्लाम का अंग बन चुकी हैं, हालांकि इस्लामी सिद्धांतों से इनका कोई सम्बन्ध नहीं है।

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किसी पैगम्बर ने अपने अनुयायियों से अपनी कब्रों के ऊपर दरगाहें बनाने, उन्हें प्रकाशित करने, अगरबत्तियाँ जलाने, चादर चढ़ाने, उर्स मनाने और मर्सिया और कव्वाली के साथ संगीत सभाएं आयोजित करने के लिए नहीं कहा ।

इस्लाम इन सभी कुरीतियों का पूर्णतः विरोधी है और इन्हें बिगाड़ कहकर रद्द करता है।

पैगम्बर मुहम्मद (आप पर अल्लाह की दया और कृपा हो) ने फरमाया :

“तबाही हो उन लोगों के लिए जिन्होंने पैगम्बरों की कब्रों को पूजा स्थल बना दिया, तुम मेरी कब्र को पूजा-स्थल न बनाना।”

दरगाह और मस्जिद में अन्तर

इस्लाम धर्म में मस्जिद इबादत का स्थान है। मुसलमान वहाँ दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़ने के लिए एकत्र होते हैं । दरगाहें बुनियादी तौर पर मुस्लिम सूफियों और संतों की कब्रों की स्मृतियाँ हैं ।

इन संतों ने अपने जीवनकाल में सामान्य जनता का प्यार और सम्मान प्राप्त किया । लोग उनकी दुर्वेशी की ओर और उनके प्रेम, सहानुभूति और समाज सेवा के सन्देश की ओर आकर्षित हुए।

जब उनकी मृत्यु हो जाती, तो उनके अनुयायी उनकी कब्रों के श्रद्धालु बन जाते और उनकी कब्रों पर वे भवन बना लिया करते जिनके नाम दरगाह या मकबरा रखे गये ।

वहाँ पर घटित होने वाले चमत्कारों और उनके द्वारा बीमारियों के इलाज की लोक-कहानियाँ गढ़ी गयी ।

कुछ लोगों ने इन स्थलों में बीमारियों के इलाज की क्षमताएँ होने के बारे में प्रचार भी शुरू कर दिया । इन गतिविधियों ने इन मकबरों को तीर्थ-यात्रा का केंद्र बना लिया ।

ख्याजा मुईनुद्दीन चिश्ती (1141-1230) की अजमेर में स्थित दरगाह भारत में एक बड़ी जियारत गाह है । अनेक महान मुस्लिम सूफियों जैसे दिल्‍ली के ख्वाजा बख्तियार काकी, पंजाब के बाबा फरीदुद्दीन गंज शकर, दिल्ली के निज़ामुद्दीन औलिया, गुलबर्गा के ख्वाजा बंदा नवाज़ और हैदराबाद में यूसुफैन की महत्वपूर्ण कब्रें हैं जिन्होंने भारत में शांति और प्यार का प्रचार किया ।

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उनके मकबरे दरगाह बन गये और बड़ी संख्या में श्रद्धालु उनकी ओर आकर्षित होते हैं । यहाँ पर सभी धर्मों के लोग आते हैं और आने वालों में अधिकतर, मुसलमानों की तुलना में ग़ैर-मुस्लिम अधिक होते हैं।

यद्यपि इस्लाम की मुख्य धारा इन्हें मान्यता नहीं देती फिर भी इन्हें भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लाम की एक सांस्कृतिक शाखा कहा जा सकता है क्योंकि इनके गुम्बदों और मीनारों के निर्माण में इस्लामी निर्माण कला का प्रयोग हुआ है । यहाँ पर कव्वालियां और मुशायरे आयोजित होते हैं।

कब्रों की पूजा को न केवल इस्लाम में मान्यता नहीं दी जाती और इसे हतोत्साहित ही नहीं किया जाता बल्कि इसकी निंदा की जाती है क्योंकि इसे अल्लाह का साझीदार बनाना समझा जाता है और यह शिर्क का एक रूप है। इस्लामी विचारधारा पूर्णतः

एकेश्वरवादी है और इसमें कोई कमी-बेशी और बिगाड़ को स्वीकार नहीं किया जाता । 

इस्लाम ईश्वरत्व और सूफीपन (Sufism) के बीच सीमाओं को अच्छी तरह परिभाषित करता है। ये दोनों विशेषताएँ आपस में मेल नहीं खातीं । यहाँ तक कि पैगम्बर भी इबादत के योग्य नहीं ।

पैगम्बरों ने स्वयं घोषणा की कि वह मनुष्य से अधिक कुछ नहीं हैं । कुरान  की पहली सूरः, सूरः फातिहा इस्लाम के अनुयायियों को दुआ करने का ढंग निम्नलिखित शब्दों में सिखाती हैः

“हम केवल तेरी ही उपासना करते हैं और हम केवल तुझ ही से सहायता माँगते हैं” (कुरान, 1:4)

इस प्रकार दोनों की सीमाएं स्पष्ट हैं इनमें कोई संदेह नहीं है।

दूसरे, इस्लामी सिद्धांत  प्रत्येक व्यक्ति को सीधे अल्लाह के सम्पर्क में ला देता है। एक व्यक्ति सीधे अल्लाह के सामने दुआ करता है और उसे बीच में किसी मध्यस्थ की चाह नहीं होनी चाहिए ।

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मनुष्य और अल्लाह के बीच कोई दलाल स्वीकार्य नहीं है । कब्रों की इबादत में मनुष्य और अल्लाह के बीच में दिवंगत सूफी को रख दिया जाता है।

इस्लाम इस रीति को बिल्कुल पसंद नहीं करता । यदि कोई जीवित पैगम्बर या सूफी मनुष्य की ओर से कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता तो एक मृतक संत किस प्रकार मनुष्य और अल्लाह के बीच में दखल दे सकता है।

कुरान  कहता है: “’तुम उन लोगों को नहीं सुना सकते जो लोग अपनी कब्रों में हैं ।” (कुरान , 35:22)

यह भी एक कारण है कि दरगाहें पूजा स्थल बनाने योग्य क्यों नहीं हैं। कुछ वर्ग मकबरो को कुछ पवित्रता प्रदान करते हैं । इससे इस्लाम के मौलिक सिद्धांत  में कोई परिवर्तन नहीं हो सकता।

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