“फतवा” किसे कहते हैं …और कैसे इस्लामी संस्थाओं की छवि खराब करने के लिए इसका इस्तेमाल होता है

“फतवा” किसे कहते हैं

फतवा इस्लामिक धर्मशास्त्र का एक धर्म शास्त्रीय दृष्टिकोण है । लेकिन कुछ लोग इसे धार्मिक न्यायालय का आदेश समझते हैं ।

जिसका कारण यह है कि कुछ हास्यास्पद फतवों को प्रचारित किया जाता है। इसके कारण सामान्य जनता में यह विश्वास पैदा हो गया कि अधिकतर मुसलमान इस तरह के फतवो को मानते हैं और उनका पालन करते हैं ।

हालांकि सामान्य मुसलमानों में से बहुत कम लोग हैं जो मुफ्ती के पास किसी मामले में कानूनी सलाह लेने के लिए जाते हैं। मीडिया विषम और अहमकाना चीजों की तलाश में रहता है और वह इस्लामी धार्मिक संस्थाओं की छवि खराब करना चाहता है। 

इसलिए वह इस तरह के दस्तावेजों पर हाथ डालता है और इसका शोर मचाता है । देश में हज़ारों मदरसे हैं और इन मदरसों के अन्दर विवाद सुलझाने वाली कमेटियाँ भी हैं ।

अतः वहाँ किसी विशेष मामले में कई तरह के धार्मिक दृष्टिकोण आ सकते हैं । यह विचित्र बात है कि मीडिया कुछ फतवों को पकड़ लेती है और उसे फैसले का रूप दे देती है और फिर उसे रूढ़िवाद के नमूने के रूप में प्रस्तुत करती है।

यह बात और अधिक कष्टप्रद है कि लोग समझते हैं कि अधिकतर मुसलमान ऐसे धार्मिक परामर्शों से गहरा लगाव रखते हैं ।

बात को उचित पृष्ठभूमि में समझने के लिए यह ध्यान में रखना चाहिए कि फतवा कोई न्यायाधीश का निर्णय नहीं है । यह मात्र धर्म शास्त्रीय दृष्टिकोण है ।

“यह मुफ्ती द्वारा दिया हुआ एक औपचारिक कानूनी दृष्टिकोण है जो किसी न्यायाधीश अथवा किसी व्यक्ति द्वारा पूछे गए प्रश्न के उत्तर में दिया जाता है ।”

फतवे मात्र दृष्टिकोण होते हैं और ये किसी पर बाध्य नहीं होते, इनको स्वीकार भी किया जा सकता है और अस्वीकार भी किया जा सकता है।

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जिन लोगों से यह दृष्टिकोण पूछा जाता है वह भी उसे मानने या पालन करने पर जोर नहीं देते । वह स्वयं कहते हैं कि आप जैसा चाहे इसे स्वीकार भी कर सकते हैं और अस्वीकार भी ।

जो लोग जटिल प्रश्नों का सामना करते हैं वह धार्मिक संस्थाओं से धर्मशास्त्रीय परामर्श लेते हैं और जब वह इन्हें प्रकृत्ति में परस्पर विरोधी पाते हैं तो उन्हें आश्चर्य नहीं होता ।

गैर ज़िम्मेदाराना फतवे अधिक लोकप्रियता प्राप्त करते हैं और ऐसे फतवों पर मुसलमानों की निंदा अखबारों में कम ही छपती है।

सन् 1989 में सलमान रुश्दी के विरुद्ध ईरान के इमाम आयतुल्लाह खुमैनी के फतवे पर इस्लामी दुनिया के प्रसिद्ध फकीहों ने तुरन्त प्रतिक्रिया व्यक्त की थी।

salman Rushdie fatwa
Image Credit: Aljazeera

सऊदी अरब के प्रामाणिक उलमा और काहिरा के अल-अजहर की प्रतिष्ठित अल-अजहर मस्जिद के शेखों ने इमाम खुमैनी के फतवे को गैर कानूनी और गैर इस्लामी घोषित किया था ।

इस्लामी कानून बिना मुकदमा चलाए किसी को मौत की सजा देने की अनुमति नहीं देता और इसका कोई फैसला इस्लामी दुनिया के बाहर लागू नहीं होता ।

मार्च, 1989 के एक इस्लामी सम्मेलन के अवसर पर 45 देशों में से 44 देशों ने एक मत होकर इमाम खुमैनी के फतवे को निरस्त कर दिया था। लेकिन इस निरस्तीकरण को अंतरराष्ट्रीय मीडिया (International Media) में बहुत कम महत्व दिया गया ।

इससे बहुत से लोगों को यह ग़लत जानकारी मिली कि पूरी मुस्लिम दुनिया रुश्दी के खून के लिए शोर मचा रही थी।

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