सूरह तीन (95)

सूरह तीन
“At-Teen”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:8 verses
पारा:30

नाम रखने का कारण

पहले ही शब्द “अत्-तीन” (इंजीर) को सूरह का नाम दिया गया है।

अवतरणकाल

कतादह (रह0) कहते हैं कि यह सूरह मदनी है। इब्ने अब्बास (रजि०) से दो कथन उल्लिखित हैं। एक यह है कि यह मक्की है और दूसरा यह कि यह मदनी है, किन्तु सर्वसामान्य विद्वान इसे मक्की ही ठहराते हैं और इसके मक्की होने का स्पष्ट लक्षण यह है कि यदि इसका अवतरण मदीना में हुआ होता तो मक्का के लिए “यह नगर” कहना यथोचित नहीं हो सकता था।

इसके अतिरिक्त सूरह की वार्ता पर विचार करने पर प्रतीत होता है कि यह मक्का मुअज़्ज़मा के भी आरम्भिक काल की अवतरित सूरतों में से है।

विषय और वार्ता

इसका विषय है प्रतिदान और दण्ड की पुष्टि। इस उद्देश्य के लिए सबसे पहले प्रतापवान नबियों के नियुक्त होने वाले स्थानों की सौगन्ध खा कर कहा गया है कि सर्वोच्च अल्लाह ने मानव को अति उत्तम प्रतिरूप का पैदा किया है।

यद्यपि इस तथ्य को दूसरी जगहों पर कुरआन मजीद में विभिन्न तरीकों से बयान किया गया है। उदाहरणतया कहीं कहा कि मानव को ईश्वर ने धरती पर ख़लीफा (प्रतिनिधि) बनाया और फ़रिश्तों को उसके आगे सज्दा करने का आदेश दिया (कुरआन 2:30-34, 6:165, 7:11, 15:28-29, 27:62, 38:71-73)।

कहीं कहा कि मनुष्य उस ईश्वरीय अमानत का वाहक हुआ है जिसे उठाने की शक्ति धरती, आकाश और पहाड़ों में भी न थी ( कुराआन 33:76)।

कहीं कहा कि हम ने आदम की सन्तान को प्रतिष्ठित किया और अपने बहुत से सृष्ट जीवों पर श्रेष्ठता प्रदान की (कुरआन 17:70), किन्तु विशेष रूप से नबियों के प्रकट होने के स्थानों की सौगन्ध खा कर यह कहना कि मानव को अत्युत्तम प्रतिरूप पर पैदा किया गया है, यह अर्थ रखता है कि मानव-जाति को इतना उत्तम रूप-प्रतिरूप पर पैदा किया गया कि उसमें नुबूवत (पैग़म्बरी) जैसे उच्चतम पद के भारवाहक लोग पैदा हुए, जिससे ऊँचा पद ईश्वर के किसी दूसरे सृष्ट-जीव को प्राप्त नहीं हुआ।

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तदान्तर यह बताया गया है कि मानव में दो प्रकार के लोग पाए जाते हैं। एक, वे जो इस अत्युत्तम प्रतिरूप में पैदा होने के बाद बुराई की ओर झुक जाते हैं और गिरते-गिरते नैतिक पतन के उस अन्तिम स्तर पर पहुंच जाते हैं जहाँ उनसे अधिक नीच कोई दूसरा प्राणी नहीं होता।

दूसरे, वे लोग जो ईमान और अच्छे कर्म का मार्ग अपना कर इस गिरावट से बच जाते हैं और उस उच्च स्थान पर स्थिर रहते हैं जो उनके उत्तम प्रतिरूप में पैदा होने को अनिवार्यतः अपेक्षित है।

अन्त में, इस तथ्य से यह प्रमाणित किया गया है कि जब मनुष्यों दो अलग-अलग और नितान्त भिन्न प्रकार के लोग पाए जाते हैं तो फिर कर्मों के प्रतिदान का कैसे इंकार किया जा सकता है।

परिणाम दोनों प्रकार के मानवों) का समान हो तो इसका अर्थ यह है कि ईश्वरीय लोक में कोई न्याय नहीं है। हालांकि मानव-प्रकृति और मानव की सामान्य बुद्धि को यह अपेक्षित है कि जो व्यक्ति भी शासक हो वह न्याय करे।

फिर इसकी कल्पना कैसे की जा सकती है कि अल्लाह, जो सब शासकों से बड़ा शासक है, न्याय नहीं करेगा।

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