सूरह तहरीम (66)

सूरह तहरीम
“At-Tahreem”

कहाँ नाज़िल हुई:मदीना
आयतें:12 verses
पारा:28

नाम रखने का कारण

“पहली आयत के शब्द “क्यों उस चीज़ को हराम (तुहर्रिम) करते हो” से उद्धृत है। इस नाम से अभिप्राय यह है यह वह सूरह है जिसमें ‘तहरीम’ (किसी चीज़ को अवैध ठहराने की घटना का उल्लेख हुआ है।

इसमें अवैध ठहराने की जिस घटना का उल्लेख किया गया है, उसके सम्बन्ध में हदीसों के उल्लेखों में दो महिलाओं की चर्चा की गई है, जो उस समय नबी (सल्ल0) की पत्नियों में से ।

एक हज़रत सफीया (रजि0), दूसरी हज़रत मारिया किब्तिया (रजि0) (और ये दोनों ही नबी (सल्ल0) के घर में सन् 7 हिजरी में प्रविष्ट हुई हैं।

इस से यह बात लगभग निश्चित हो जाती है कि इस सूरह का अवतरण सन् 7 हिजरी या 8 हिजरी के मध्य किसी समय हुआ था।

विषय और वार्ताएँ

इस सूरह में अल्लाह के रसूल (सल्ल0) की पवित्र पत्नियों के सम्बन्ध में कुछ घटनाओं की ओर संकेत करते हुए कुछ गम्भीर समस्याओं पर प्रकाश डाला गया है:

एक यह कि हलाल तथा हराम और वैध तथा अवैध की सीमाएं निर्धारित करने के अधिकार निश्चित रूप से सर्वोच्च अल्लाह के हाथ में हैं, और जन सामान्य तो अलग रहे, पैग़म्बर को भी अपने तौर पर अल्लाह की ग्राह्य ठहराई हुई किसी चीज़ को हराम कर लेने का अधिकार नहीं है।

दूसरे यह कि मानव समाज में नबी (सल्ल0) का मकाम बहुत ही नाजुक मक़ाम है। एक साधारण बात भी जो किसी दूसरे मनुष्य के जीवन में घटित हो तो कुछ अधिक महत्त्व नहीं रखती लेकिन नबी (सल्ल0) के जीवन में घटित हो तो उसकी हैसियत कानून की हो जाती है।

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इसलिए अल्लाह की ओर से नबियों के जीवन पर ऐसी कड़ी निगरानी रखी गई है कि उनका कोई छोटे से छोटा कदम उठाना भी ईश्वरीय इच्छा से हटा हुआ न हो, ताकि इस्लामी कानून और उसके सिद्धान्त अपने बिल्कुल वास्तविक रूप में अल्लाह के बन्दों तक पहुंच जाएं।

तीसरी बात यह है कि तनिक सी बात पर जब नबी (सल्ल0) को टोक दिया गया और न केवल उसका सुधार किया गया, बल्कि उसे रिकार्ड पर भी लाया गया, तो यह चीज़ निश्चय ही हमारे दिल में यह असंशय का भाव पैदा कर देती है कि नबी (सल्ल0) के पवित्र जीवन में जो कर्म और जो नियम-सम्बन्धी आदेश और निर्देश भी अब हमें मिलते हैं और जिस पर अल्लाह की ओर से कोई पकड़ या संशोधन रिकार्ड पर मौजूद नहीं है, वह सर्वथा विशुद्ध और ठीक है, और पूर्ण रूप से अल्लाह की इच्छा के अनुकूल है।

चौथी बात (यह कि अल्लाह ने न केवल यह कि नबी (सल्ल0) को । साधारण सी बात पर टोक दिया, बल्कि ईमान बालों की माताओं को (अर्थात् न सल्ल0 की पलियों को उनकी कुछ गलतियों पर कड़ाई के साथ सचेत किया, बल्कि (इस पकड़ ओर चेतावनी को अपनी किताब “कुरआन” में सदैव के लिए अंकित भी कर दिया)।

इनमें निहित उद्देश्य इसके सिवा और क्या हो सकता है कि अल्लाह इस तरह ईमान वालों को अपने महापुरुषों के आदर-सम्मान की वास्तविक मर्यादाओं एवं सीमाओं से परिचित करना चाहता है।

नबी नबी है, ईश्वर नहीं है कि उससे कोई भूल-चूक न हो, नबी (सल्ल0) इस लिए आदरणीय नहीं हैं कि उनसे भूल-चूक का होना असम्भव है, बल्कि वे आदरणीय इसलिए हैं कि वे ईश्वरीय इच्छा के पूर्ण प्रतिनिधि हैं, और उनकी छोटी सी भूल को भी अल्लाह ने सुधारे बिना नहीं छोड़ा है।

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इसी तरह आदरणीय सहाबा हों या नबी (सल्ल0) की पुण्यात्मा पत्नियाँ, ये सब मनुष्य थे, फरिश्ते या परामानव न थे। उनसे भूल-चूक हो सकती थी।

उनको जो उच्च पद प्राप्त हुआ, इसलिए हुआ कि अल्लाह के मार्गदर्शन और अल्लाह के रसूल (सल्ल0) के प्रशिक्षण ने उनको मानवता का उत्तम आदर्श बना दिया था।

उनका जो कुछ भी सम्मान है, इसी कारण है, न कि इस परिकल्पना के आधार पर कि वे कुछ ऐसी विभूतियाँ थीं जो गलतियों से बिल्कुल पाक थीं। 

इसी कारण नबी (सल्ल0) के शुभकाल में साहाबा या आपकी पुण्यात्मा पत्नियों से मनुष्य होने के कारण जब भी कोई भूल-चूक हुई उस पर टोका गया। उनकी कुछ गलतियों का सुधार नबी (सल्ल0) ने किया, जिसका उल्लेख हदीसों में बहुत से स्थानों पर हुआ है और कुछ ग़लतियों का उल्लेख कुरआन मजीद में करके अल्लाह ने स्वयं उनको सुधारा, ताकि मुसलमान कभी महापुरुषों के आदर की कोई अतिशयोक्तिपूर्ण धारणा न बना लें।

पाँचवीं बात यह है कि अल्लाह का धर्म बिल्कुल बेलाग है, उसमें हर व्यक्ति के लिए केवल वह है जिसका वह अपने ईमान और कर्मों की दृष्टि से पात्र है। इस मामले में विशेष रूप से कुछ नबी (सल्ल0) की पुण्यात्मा पत्नियों के सामने तीन प्रकार की स्त्रियों को उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत किया गया है।

एक उदाहरण हज़रत नूह (अलै0) और हज़रत (अलै0) की काफिर पत्नियों का है। नबियों की पत्नियाँ होना (जिनके) कुछ काम न आया। दूसरा उदाहरण फिरऔन की पत्नी का है। चूंकि वे ईमान ले आई, इसलिए फ़िरऔन जैसे सबसे बड़े काफिर की पत्नी होना भी उनके लिए किसी हानि का कारण न बन सका।

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तीसरा उदाहरण हज़रत मरयम (अलै0) का है, जिन्हें महान पद इसलिए मिला कि अल्लाह ने जिस कठिन परीक्षा में उन्हें डालने का निर्णय किया था, उसके लिए वे नतमस्तक हो गई।

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