सूरह शूरा (42)

सूरह शूरा
“Ash-Shooraa”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:53 verses
पारा:25

नाम रखने का कारण

आयत 38 के वाक्यांश “अपने मामले आपस के परामर्श (अश-शूरा) से चलाते हैं,” से उद्धृत है। इस नाम का मतलब यह है कि वह सूरह जिसमें शूरा शब्द आया है।

अवतरणकाल

इसके विषय वस्तु पर विचार करने से साफ महसूस होता है कि यह सूरह 41 (हा. मीम. अस्-सज्दा) के पश्चात् संसर्गतः अवतरित हुई होगी, क्योंकि यह एक प्रकार से बिल्कुल उसकी अनुपूरक दिखाई देती है।

सूरह 41 (हा. मीम. अस-सज्दा) में कुरैश के सरदारों के अन्धे-बहरे विरोध पर बड़ी गहरी चोटें की गई थीं, उस चेतावनी के तुरन्त पश्चात् यह सूरह अवतरित की गई जिसने समझाने-बुझाने का हक अदा कर दिया।

विषय और वार्ता

बात का आरम्भ इस तरह किया गया है कि मुहम्मद (सल्ल.) पर ईश-प्रकाशना कोई निराली बात नहीं। ऐसी ही प्रकाशना इसी प्रकार के आदेश के साथ अल्लाह इससे पहले भी नबियों (उन पर ईश्वर की दया और कृपा हो) पर निरन्तर भेजता रहा है।

इसके बाद बताया गया है कि नबी (सल्ल.) केवल बेसुध लोगों को चौकाने और भटके हुओं को रास्ता बताने आए हैं। (वह ख़ुदा के पैदा किए हुए लोगों के भाग्य का मालिक नहीं बनाया गया है।) उसकी बात न मानने वालों का संप्रेक्षण (जांच पड़ताल) और उन्हें यातना देना या न देना अल्लाह का अपना काम है।

फिर इस समस्या के रहस्य को व्यक्त किया गया है कि अल्लाह ने सारे मनुष्यों को जन्मजात सत्यनिष्ठ क्यों न बना दिया और यह मतभेद की सामर्थ्य क्यों दे दी जिसके कारण लोग विचार और कर्म के हर उल्टे-सीधे रास्ते पर चल पड़ते हैं।

ये भी पढ़े -   सूरह इंफितार (82)

इसके बाद यह बताया गया है कि जिस धर्म को मुहम्मद (सल्ल.) प्रस्तुत कर रहे हैं, वह वास्तव में है क्या उसका सर्वप्रथम आधार यह है कि अल्लाह चूँकि जगत् और मानव का सृष्टा, मालिक और वास्तविक संरक्षक मित्र है, इसलिए वही मानव का शासक भी है और उसी को यह अधिकार प्राप्त है कि मानव को दीन और शरीयत प्रदान करे।

दूसरे शब्दों में नैसर्गिक प्रभुत्व की तरह विधि-विधान सम्बन्धी प्रभुत्व भी अल्लाह ही के लिए सुरक्षित है। इसी आधार पर अल्लाह ने आदिकाल से मानव के लिए धर्म निर्धारित किया है। वह एक ही धर्म था जो हरेक युग में समस्त नबियों को दिया जाता रहा।

कोई नबी भी अपने किसी अलग धर्म का प्रवर्तक नहीं था। वह धर्म सदैव इस उद्देश्य के लिए भेजा गया है कि धरती पर वही स्थापित और प्रचलित और क्रियान्वित हो। पैग़म्बर (उनपर ईश-दया और कृपा हो) इस धर्म के मात्र प्रचार पर नहीं, बल्कि उसे स्थापित करने के सेवा-कार्य पर नियुक्त किए हुए थे।

अब मुहम्मद (सल्ल.) इसलिए भेजे गए हैं कि कृत्रिम पंथों और कृत्रिम धर्मों और मानव-रचित धर्मों की जगह वही वास्तविक धर्म लोगों के समक्ष प्रस्तुत करें और (पूरी दृढ़ता के साथ) उसी को स्थापित करने की कोशिश करें। 

तुम लोगों को एहसास नहीं है कि अल्लाह के धर्म को छोड़कर अल्लाह के अतिरिक्त दूसरों के बनाए हुए धर्म और कानून को ग्रहण करना अल्लाह के मुकाबले में कितना बड़ा दुस्साहस है।

अल्लाह की दृष्टि में ये निकृष्टतम बहुदेववादी प्रथा और जघन्य अपराध है, जिसका कठोर दण्ड भुगतना पड़ेगा। इस तरह धर्म की एक साफ और स्पष्ट धारणा प्रस्तु करने के पश्चात् कहा गया है कि तुम लोगों को समझाकर सीधे रास्ते पर लाने के लिए जो उत्तम से उत्तम उपाय सम्भव था वह प्रयोग में लाया जा चुका।

ये भी पढ़े -   सूरह कौसर (108)

इसपर भी यदि तुम मार्ग न पाओ तो फिर संसार में कोई चीज़ तुम्हें सीधे रास्ते पर नहीं ला सकती। इन यथार्थ तथ्यों को प्रस्तुत करते बीच-बीच में सक्षिप्त रूप में एकेश्वरवाद और परलोकवाद के प्रमाण दिए गए हैं और संसारिकता के परिणामों से सावधान किया गया है।

फिर वार्ता को समाप्त करते हुए दो महत्त्वपूर्ण बातें कही गई हैं :

एक यह कि मुहम्मद (सल्ल.) का अपने जीवन के आरम्भिक 40 वर्षों में किताब की धारणा से बिल्कुल रहित और ईमान की समस्याओं और वार्ताओं से नितान्त अनभिज्ञ रहना, और फिर अचानक इन दोनों चीजों को लेकर संसार के समक्ष आ जाना आपके नबी होने का स्पष्ट प्रमाण है।

दूसरे यह कि ईश्वर ने यह शिक्षा तमाम नबियों की तरह आप (सल्ल.) को भी तीन तरीकों से दी है- एक प्रकाशना, दूसरे परदे के पीछे से आवाज़ और तीसरे फ़रिश्ते के द्वारा संदेश।

यह इसलिए स्पष्ट किया गया, ताकि विरोधी लोग यह मिथ्या रोपण न कर सकें कि नबी (सल्ल.) ईश्वर से उसके सम्मुख होकर बात करने का दावा कर रहे हैं।

Leave a Reply