सूरह शम्स (91)

सूरह शम्स
“Ash-Shams”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:15 verses
पारा:30

नाम रखने का कारण

पहले ही शब्द “अश्-शम्स” (सूरज) को इसका नाम दिया गया है।

अवतरणकाल: विषय और वर्णन-शैली से यह मालूम होता है कि यह सूरह भी मक्का मु के प्रारम्भिक काल में उस समय अवतरित हुई है जब अल्लाह के रसूल (सल्ल0) विरोध खूब ज़ोरों से होने लगा था।

विषय और वार्ता

इसका विषय भलाई और बुराई का अन्तर समझाना और उन लोगों को हो परिणाम से डराना है जो इस अन्तर को समझने से इन्कार और बुराई की राह पर चलने की हठ करते हैं।

विषय की दृष्टि से यह सूरह दो भागों पर आधारित है। पहला भाग सूरह के आरम्भ से शुरू हो कर आयत 10 पर समाप्त होता है और दूसरा भ आयत 11 से सूरह के अन्त तक चलता है।

पहले भाग में तीन बातें समझाई गई हैं। एक यह कि भलाई और बुराई एक दूसरे से भिन्न और लक्षणों और परिणामों की दृष्टि से एक दूसरे के नितान्त प्रतिकूल हैं।

दूसरे, यह कि अल्लाह ने मानवात्मा को शरीर, इंद्रियाँ और बुद्धि की शक्तियाँ देकर संसार में बिल्कुल बेखबर नहीं छोड़ दिय है, बल्कि एक दैवी प्रेरणा के द्वारा उसके अचेतन में भलाई और बुराई का अन्तर और बुरे का विभेद और भलाई के भलाई और बुराई के बुराई होने का एहसास उत्तर दिया है।

तीसरे, यह कि मनुष्य का अच्छा या बुरा भविष्य इस पर निर्भर करता है कि उसमें विवेक, इरादे और फैसले की जो शक्तियाँ अल्लाह ने रख दी हैं, उनको प्रयोग में लाकर वह अपनी व्यक्तिगत अच्छी और बुरी अभिरुचियों में से किसको उभारता किसको दबाता है।

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दूसरे भाग में समृद जाति के ऐतिहासिक दृष्टान्त को प्रस्तुत क हुए रिसालत (ईशदूतत्व, पैग़म्बरी) के महत्व को समझाया गया है। रसूल (पैग़म्बर) दुनिया में इसलिए भेजा जाता है कि भलाई और बुराई का जो ईश-प्रेरित ज्ञान ईश्क ने मानव की प्रकृति में रख दिया है वह अपने में स्वयं मानव के मार्गदर्शन के पर्याप्त नहीं है।

प्रेरणा की सहायता के लिए नबियों (अलै0) पर स्पष्टतः औ साफ-साफ वह्य (प्रकाशना) अवतरित की, ताकि वे लोगों को खोल कर बताएँ भलाई क्या है और बुराई क्या?

ऐसे ही एक नबी हज़रत सालेह (अलै०) समूद जानि की ओर भेजे गए थे। किन्तु वह जाति अपने मन की बुराइयों में डूब कर इतना सरकश हो गई थी कि उसने उनको झुठला दिया।

इसका परिणाम अन्ततः यह हुआ कि पूरी जाति विनष्ट करके रख दी गई। समूद का वह किस्सा (जिस समय सुनार गया था, मक्का में) उस समय परिस्थितियाँ वही विद्यमान थीं जो सालेह (अलै0) मुकाबले में समूद जाति के दुष्टों ने पैदा कर रखी थीं।

अतः उन परिस्थितियों में किस्सा सुना देना अपने आप में मक्का-निवासियों को यह समझा देने के लिए पर्याप था, कि समूद का यह ऐतिहासिक दृष्टान्त उन पर किस तरह चस्पाँ हो रहा है।

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