सूरह सज्दा (32)

सूरह सज्दा
“As-Sajda”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:30 verses
पारा:21

नाम रखने का कारण

आयत 15 में सज्दा का जो प्रसंग आया है, उसी को सूरह का शीर्षक ठहरा दिया गया है।

अवतरणकाल

वर्णन-शैली से ऐसा लगता है कि इसका अवतरणकाल मक्का का मध्यकाल है, और उसका भी आरम्भिक काल, (जब मक्का के काफिरों के अत्याचार अभी उग्र रूप धारण नहीं कर सके थे)।

विषय और वार्ताएँ

सूरह का विषय एकेश्वरवाद, परलोकवाद और पैगम्बर के सम्बन्ध में लोगों के सन्देहों को दूर करना और इन तीनों सच्चाईयों पर ईमान लाने का निमंत्रण देना है। (सत्य के आमंत्रण की इन तीनों मौलिक बातों पर मक्का के काफिरों के आक्षेपों का उत्तर देते हुए सबसे पहले उनसे) यह कहा गया है कि निस्सन्देह यह ईश्वरीय वाणी है और इसलिए अवतरित की गई है कि नुबूवत की बरकत से वॉचत, बेसुध पड़ी हुई एक जाति को चौंकाया जाए।

इसे तुम झूठ कैसे कह सकते हो जबकि इसका अल्लाह की ओर से अवतरित होना बिल्कुल स्पष्ट है। फिर उनसे कहा गया है कि यह कुरआन जिन तथ्यों को तुम्हारे सामने प्रस्तुत करता है, बुद्धि से काम लेकर स्वयं सोचो कि इनमें क्या चीज़ अचम्भे की है।

आकाश और धरती की व्यवस्था को देखो, स्वयं अपने पैदा होने और अपनी संरचना पर विचार करो, क्या यह सब कुछ कुरआन की शिक्षाओं की सत्यता पर साक्ष्य नहीं हैं।

फिर परलोक का एक चित्रण प्रस्तुत किया गया है और ईमान के सुखद फल और कुफ (इन्कार) के दुष्परिणामों को बयान करके इस बात की प्रेरणा दी गई है कि लोग दुष्परिणाम सामने आने से पहले कुफ़ को त्याग दें और कुरआन की इस शिक्षा को स्वीकार कर लें।

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फिर उनको बताया गया है कि यह अल्लाह की बड़ी दया है कि वह मानव के दोषों पर अचानक अन्तिम और निर्णायक यातना में उसे नहीं पकड़ लेता, बल्कि उससे पहले हल्की-हल्की चोटें लगाता रहता है, ताकि वह सतर्क हो और उसकी आँखें खुल जाएँ।

फिर कहा कि दुनिया में किताब के अवतरण की वह कोई पहली और अद्भुत घटना तो नहीं है। इससे पहले आख़िर मूसा (अलै.) पर भी तो किताब आई थी, जिसे तुम सब लोग जानते हो।

विश्वास रखो कि यह किताब अल्लाह की ओर से आई है और भली-भाँति समझ लो कि अब फिर वही कुछ होगा जो मूसा के युग में हो चुका है।

नायकता और पेशवाई अब उन्हीं के हिस्से में आएगी जो इस ईश्वरीय ग्रंथ को मान लेंगे। इसे रद्द कर देने वालों के लिए असफलता निश्चित हो चुकी है।

फिर मक्का के काफिरों से कहा गया है कि अपनी व्यापारिक यात्राओं में तुम जिन पिछली विनष्ट जातियों की बस्तियों पर से गुजरते हो. उसका परिणाम देख लो। क्या यही परिणाम तुम अपने लिए पसन्द करते हो? ज़ाहिर से धोखा न खाओ।

आज (ईमानवालों को इन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है, उन्हें देखकर ) तुम यह समझ बैठे हो कि यह चलने वाली बात नहीं है। किन्तु यह केवल तुम्हारी निगाह का धोखा है।

क्या यह तुम्हारा रात-दिन का निरीक्षण नहीं है कि आज एक भू-भाग बिल्कुल सूखा हुआ बिना किसी हरियाली के पड़ा हुआ है, किन्तु कल एक ही व में वह इस प्रकार फबक उठता है कि उसके चप्पे-चप्पे से विकास की शक्तियाँ उभरनी शुरू हो जाती हैं।

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वार्ता की समाप्ति पर नबी (सल्ल.) को सम्बोधित करके कहा गया है कि ये लोग तुम्हारे मुख से फैसले के दिन की बात सुनकर उसका उपहास करते हैं।

इनसे कहो कि जब हमारे और तुम्हारे फैसले का वक्त आ जाएगा, उस वक्त इस बात को माना तुम्हारे लिए कुछ भी लाभदायक न होगा। मानना है तो अभी मान लो।

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