सूरह रोम (30)

सूरह रोम
“Ar-Rum”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:60 verses
पारा:21

नाम रखने का कारण

पहली ही आयत के शब्द “रूमी पराजित हो गए हैं” से उद्धृत है।

अवतरणकाल

आरम्भ ही में कहा गया है, “रूमी करीब के भू-भाग में पराजित हो गए हैं। “उस समय अरब से मिले हुए सभी अधिकृत भू-भाग पर ईरानियों का प्रभुत्व सन् 615ई. में अपनी पूर्णता को पहुँचा था।

इसलिए विशुद्ध रूप से यह कहा जा सकता है कि यह सूरह उसी वर्ष अवतरित हुई थी और यह वही वर्ष था जिसमें हबशा की ओर हिजरत की गई थी।

विषय और वार्ता

इस सूरह में वार्ता का आरम्भ इस बात से किया गया है कि आज रूमी पराजित हो गए हैं, किन्तु थोड़े वर्ष न बीतने पाएँगे कि पासा पलट जाएगा और जो पराजित है वह विजयी हो जाएगा।

इस भूमिका से इस भाव की अभिव्यक्ति हुई कि मानव अपनी बाह्य दृष्टि के कारण वही कुछ देखता है जो बाह्य रूप से उसकी आँखों के सामने होता है, किन्तु इस बाह्य के आवरण के पीछे जो कुछ है उसकी उसे ख़बर नहीं होती।

जब दुनिया के ज़रा ज़रा से मामलों में मनुष्य अपनी बाह्य दृष्टि के कारण) ग़लत अनुमान लगा बैठता है तो फिर समग्र जीवन के मामले में संसारिक जीवन के बाह्य पर भरोसा कर बैठना कितनी बड़ी भूल है।

इस प्रकार रूम और ईरान के मामले में अभिभाषण का रुख परलोक के विषय की ओर फिर जाता है और निरन्तर 27 आयत तक विभिन्न ढंग से यह समझाने की कोशिश की जाती है कि परलोक संम्भव भी है, बुद्धिसंगत भी है और आवश्यक भी है।

ये भी पढ़े -   सूरह फ़ातिर (35)

इस सिलसिले में परलोक को प्रमाणित करते हुए जगत् के जिन लक्षणों को साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है वे ठीक वही लक्षण हैं जो एकेश्वरवाद न को प्रमाणित करते हैं।

इसलिए आयत 41 के आरम्भ से अभिभाषण का रुख एकेश्वरवाद की पुष्टि और बहुदेववाद के खण्डन की ओर फिर जाता है और बताया गया है कि बहुदेववाद जगत् की प्रकृति और मानव की प्रकृति के विरुद्ध है। इसलिए जहाँ भी मनुष्य दे ने इस गुमराही को अपनाया है वहीं बिगाड़ और उपद्रव खड़ा हुआ है।

इस अवसर पर प्य फिर उस महाबिगाड़ की ओर, जो उस समय संसार के दो सबसे बड़े राज्यों के मध्य युद्ध के कारण पैदा हो गया था, संकेते किया गया है और यह बताया गया है कि यह बिगाड़ भी बहुदेववाद के परिणामों में से है।

वार्ता के समापन पर मिसाल के रूप में लोगों को समझाया गया है कि जिस प्रकार निर्जीव पड़ी हुई भूमि अल्लाह की भेजी हुई वर्षा से सहसा के लिए जी उठती है, उसकी प्रकार अल्लाह की भेजी हुई प्रकाशना और नुबूवत भी निर्जीव पड़ी हुई मानवता के हित में एक दयालुता-वृष्टि हैं। इस अवसर से लाभ उठाओगे तो यही अरब की सूनी भूमि ईश्वरीय दया से लहलहा उठेगी। लाभ न उठाओगे तो अपने ही को हानि पहुँचाओगे ।

Leave a Reply