सूरह नज्म (53)

सूरह नज्म
“An-Najm”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:62 verses
पारा:27

नाम रखने का कारण

पहले ही शब्द ‘अन-नज्म’ (कसम है तारे की) से उद्धृत है और केवल चिन्ह के रूप में इसे इस सूरह का नाम दिया गया है।

अवतरणकाल

हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद (रजि.) से उल्लेखित है कि “पहली सूरह जिसमें सज्दा की आयत अवतरित हुई अन-नज्म है। और यह भी कि यह कुरआन मजीद की वह पहली सूरह है जिसे अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने कुरैश के एक जन समूह में (और इब्ने मरदोया के उल्लेख के अनुसार हरम में) सुनाया था।

जन समूह में काफिर और ईमान वाले सब मौजूद थे। अन्त में में जब आपने सज्दा की आयत पढ़कर सज्दा किया तो सभी उपस्थित लोग आपके साथ स मे गिर गए और बहुदेववादियों के वे बड़े-बड़े सरदार तक जो विरोध में आगे-आगे थे, सज्दा किए बिना न रह सके।

इब्ने सॉद का बयान है कि इससे पहले रजब सन् 5 नबवी में सहाबा की एक छोटी-सी जमात हबशा की ओर हिजरत कर चुकी थी। फिर जब उसी वर्ष रमज़ान में यह घटना घटी तो हबशा के मुहाजिरों तक यह किस्सा इस रूप में पहुँचा कि मक्का के काफिर मुसलमान हो गए हैं।

इस ख़बर को सुनकर उनमें से कुछ लोग शव्वाल सन् 5 नबवी में मक्का वापस आ गए। मंगर यहाँ आकर मालूम हुआ कि ज़ुल्म की चक्की उसी तरह चल रही है जिस तरह पहले चल रही थी।

अन्ततः हब्शा की दूसरी हिजरत घटित हुई जिसमें पहली हिजरत से भी अधिक लोग मक्का छोड़कर चले गए। इस तरह यह बात लगभग निश्चयात्मक रूप से मालूम हो जाती है कि यह सूरह रमज़ान सन् 5 हिजरी में अवतरित हुई है।

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ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

अवतरणकाल के इस विस्तार से मालूम हो जाता है कि वो परिस्थितियाँ क्या थीं, जिनमें यह सूरह अवतरित हुई। (मक्का के काफिरों की निरंतर यह कोशिश रहती थी कि) ईश्वरीय वाणी को न स्वयं सुनें न किसी को सुनने दें, और उसके विरुद्ध तरह-तरह की भ्रामक बातें फैलाकर केवल अपने झूठे प्रोपेगेंडा के बल पर आपके आह्वान को दबा दें।

इन्हीं परिस्थितियों में एक दिन पवित्र हरम में जब यह घटना घटी कि नबी (सल्ल.) के मुख से इस सूरह नज्म को सुनकर आपके साथ कुरैश के काफिर भी सज्दे में गिर गए, तो बाद में उन्हें बड़ी परेशानी हुई कि यह हमसे क्या कमज़ोरी ज़ाहिर हुई।

और लोगों ने भी इसके कारण उनपर चोट करना शुरू कर दी कि दूसरों को तो इस वाणी को सुनने से रोकते थे, आज स्वयं उसे न केवल यह कि कान लगाकर सुना, बल्कि मुहम्मद (सल्ल.) के साथ सज्दा भी कर गुज़रे।

विषय और वार्ता

अभिभाषण का विषय मक्का के काफिरों को उस नीति की ग़लती पर सावधान करना है जो वे कुरआन और मुहम्मद (सल्ल.) के सिलसिले में अपनाए हुए थे।

वार्ता का आरम्भ इस तरह किया गया है कि मुहम्मद (सल्ल.) बहके और भटके हुए आदमी नहीं हैं, जैसा कि तुम उनके विषय में प्रचार करते फिर रहे हो, और न इस्लाम की यह शिक्षा और आमंत्रण उन्होंने स्वयं अपने मन से गढ़ लिया है, जैसा कि तुम अपनी दृष्टि में समझे बैठे हो।

बल्कि जो कुछ वे प्रस्तुत कर रहे हैं वह विशुद्ध प्रकाशना है, जो उनपर अवतरित की जाती है। जिन सच्चाइयों को तुम्हारे सामने बयान करते हैं वे उनकी कल्पना और अटकल की उपज नहीं हैं, बल्कि उनकी आँखों देखी सच्चाईयाँ हैं।

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