सूरह कियामाह (75)

सूरह कियामाह
“Al-Qiyamah”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:40 verses
पारा:29

नाम रखने का कारण

पहली ही आयत के शब्द “अल्-कियामह” (प्रलय, परलोक, कियामत ) को इस सूरह का नाम दिया गया है और यह केवल नाम ही नहीं है, बल्कि विषय-वस्तु की दृष्टि से इस सूरह का शीर्षक भी है, क्योंकि इसकी वार्ता कयामत के सम्बन्ध में है।

अवतरणकाल

इसकी वार्ता में एक आन्तरिक साक्ष्य ऐसा मौजूद है जिससे मालूम होता है कि यह बिल्कुल आरम्भिक काल में अवतरित होने वाली सूरतों में से है।

विषय और वार्ता

यहाँ से ईश्वरीय वाणी (कुरआन मजीद) के अन्त तक जो सूरतें पाई जाती हैं, उनमें से अधिकतर अपने विषय और अपनी वर्णन शैली की दृष्टि से उस काल खण्ड की अवतरित मालूम होती हैं, जब सूरह 74 (अल्-मुद्दस्सिर) की 7 आरम्भिक आय के पश्चात् कुरआन के अतवरण का क्रम वर्षा की तरह आरम्भ हो गया था।

इस सूरह में परलोक का इन्कार करने वालों को सम्बोधित कर के उनके एक-एक सन्देह और एक-एक आक्षेप का उत्तर दिया गया है, बड़े सुदृढ़ प्रमाणों के साथ कयामत (प्रलय और परलोक) की सम्भावना और प्रकटीकरण और अवश्यम्भावित का प्रमाण दिया गया है और यह भी साफ-साफ बता दिया गया है कि जो लोग भी आख़िरत का इन्कार करते हैं उनके इन्कार का वास्तविक कारण यह नहीं है कि उनकी बुद्धि इसे असम्भव समझती है, बल्कि इसका वास्तविक प्रेरक यह है कि उनके मन की इच्छाएं इसे मानना नहीं चाहतीं।

इसके साथ ही उन लोगों को सावधान किया गया है कि जिस समय के आने का तुम इन्कार कर रहे हो वह आकर रहेगा, तुम्हारा सब किया-घरा तुम्हारे सामने ला कर रख दिया जाएगा, और वास्तव में तो अपना कर्म-पत्र देखने से भी पहले तुम में से हर व्यक्ति को स्वयं मालूम होगा कि वह दुनिया में क्या करके आया है।

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