सूरह कलम (68)

सूरह कलम
“Al-Qalam”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:52 verses
पारा:29

नाम रखने का कारण

इस सूरह का नाम ‘नून’ भी है और ‘अल्-कलम’ भी। दोनों शब्द सूरह के आरम्भ ही में मौजूद हैं।

अवतरणकाल

यह मक्का मुअज़्ज़मा के आरंभिक काल में (उस समय) अवतरित हुई थी जब अल्लाह के रसूल (सल्ल0) का विरोध बड़ी हद तक उग्र रूप धारणा कर चुका था।

विषय और वार्ता

इसमें तीन वार्ताएं वर्णित हुई हैं। विरोधियों के आक्षेपों का उत्तर, उनको चेतावनी और उपदेश और अल्लाह के रसूल (सल्ल0) को धैर्य और अपनी जगह जमे रहने का सुझाव।

वार्ता के आरम्भ में अल्लाह के रसूल (सल्ल0) से कहा गया है कि ये काफ़िर तुम्हें दीवाना कहते हैं, हालांकि जो किताब तुम प्रस्तुत कर रहे हो और नैतिकता के जिस उच्च पद पर तुम आसीन हो, वह स्वंय इनके इस झूठ के खण्डन के लिए पर्याप्त है।

शीघ्र ही वह समय आने वाला है जब सभी देख लेंगे कि दीवाना कौन था और बुद्धिमान कौन था। अतः विरोध का जो तूफान तुम्हारे विरुद्ध उठाया जा रहा है, उसके दबाव में कदापि न आना।

फिर जन सामान्य की आँखें खोलने के लिए नाम लिए बिना विरोधियों में से एक प्रमुख व्यक्ति का चरित्र प्रस्तुत किया गया है, ताकि लोग देख लें कि) अल्लाह के रसूल (सल्ल0) किस पवित्र नैतिक स्वभाव के मालिक हैं और आपके विरोध में मक्का के जो सरदार आगे-आगे हैं उनमें किस चरित्र के लोग सम्मिलित हैं।

इसके पश्चात् आयत 17-33 तक एक बाग़ वालों का दृष्टान्त प्रस्तुत किया गया है, जो अल्लाह से सुख-सामग्री पा कर उसके प्रति अंकृतज्ञ रहे और उनमें जो व्यक्ति सबसे अच्छा था, समय पर उसकी नसीहत न मानी।

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अन्ततः वे उस कृपानिधि से वंचित हो कर रह गए। ये दृष्टान्त प्रस्तुत करके मक्का वालों को सवाधान किया गया है, यदि तुम अल्लाह के रसूल (सल्ल0) की बात न मानोगे तो तुम्हें भी उसी तरह विनाश का सामना करना पड़ेगा।

फिर आयत 34-47 तक निरन्तर काफिरों को हितोपदेश दिया गया है, जिसमें कहीं तो सम्बोधन प्रत्यक्षतः उनसे है और कहीं अल्लाह के रसूल (सल्ल0) को सम्बोधित करते हुए सचेत उनको ही किया गया है।

अन्त में अल्लाह के रसूल (सल्ल0) को आदेश दिया गया है कि अल्लाह का फैसला आने तक जिन कठिनाइयों का भी धर्म प्रसार के मार्ग में सामना करना पड़े, उनको धैर्य के साथ सहन करते चले जाएं और उस अधैर्य से बचें, जिसके कारण यूनुस (अलै0) आज़माइश में डाले गए थे।

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