सूरह मुजम्मिल (73)

सूरह मुजम्मिल
“Al-Muzzammil”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:20 verses
पारा:29

नाम रखने का कारण

पहली ही आयत के शब्द ‘अल्-मुज्ज़म्मिल” (ओढ़-लपेट कर सोने वाले) को इस सूरह का नाम दिया गया है। यह केवल नाम है, विषय-वस्तु की दृष्टि से इसका शीर्षक नहीं है।

अवतरणकाल

इस सूरह के दो खण्ड हैं (पहला खण्ड आरम्भ से आयत 19 तक और सूरह का शेष भाग दूसरा खण्ड है।) दोनों खण्ड दो अलग-अलग समयों में अवतरित हुए हैं।

पहला खण्ड सर्वसम्मति से मक्की है। रहा यह प्रश्न कि यह मक्की जीवन के किस काल खण्ड में अवतरित हुआ है, तो इस खण्ड की वार्ताओं के आन्तरिक साक्ष्य से मालूम होता है कि पहली बात यह कि यह नबी (सल्ल0) की नुबूवत के प्रारम्भिक काल ही में अवतरित हुआ होगा, जबकि अल्लाह की ओर से इस पद के लिए आपको प्रशिक्षित किया जा रहा था।

दूसरी बात यह कि उस समय कुरआन मजीद का कम से कम इतना अंश अवतरित हो चुका था कि उसका पाठ करने में अच्छा-खासा समय लग सके।

तीसरी बात यह कि (उस समय) अल्लाह के रसूल (सल्ल0) इस्लाम का खुले रूप में प्रचार करना आरम्भ कर चुके थे और मक्का में आप का विरोध ज़ोरों से होने लगा था।

दूसरे खंड के सम्बन्ध में यद्यपि बहुत से टीकाकारों ने यह विचार व्यक्त किया है कि वह भी मक्का ही में अवतरित हुआ है, किन्तु कुछ दूसरे टीकाकारों ने उसे मदनी ठहराया है।

विषय और वार्ताएँ

पहली 7 आयतों में अल्लाह के रसूल (सल्ल0) को आदेश दिया गया है कि जिस महान कार्य का बोझ आप पर डाला गया है, उसके दायित्वों के निर्वाह के लिए।

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आप अपने को तैयार करें, और उसका व्यावहारिक रूप यह बताया गया है कि रातों को उठ कर आप आधी-आधी रात या उससे कुछ कम-ज़्यादा नमाज़ पढ़ा करें, आयत 8 से 14 तक नबी (सल्ल0) को यह निर्देश दिया गया है कि सबसे कट कर उस प्रभु के हो रहें जो सारे जगत् का मालिक है।

अपने सारे मामले उसी को सौंपकर निश्चिन्त हो जाएँ। विरोधी जो बातें आपके विरुद्ध बना रहे हैं उन पर धैर्य से काम लें, उनके मुंह न लगें और उनका मामला ईश्वर पर छोड़ दें कि वही उनसे निपट लेगा।

इसके बाद आयत 15 से 19 तक मक्का के उन लोगों को, जो अल्लाह के रसूल (सल्ल0) का विरोध कर रहे थे, सावधान किया गया है कि हम ने उसी तरह तुम्हारी ओर एक रसूल भेजा है, जिस तरह फ़िरऔन की ओर भेजा था।

फिर देख लो कि जब फिरऔन ने अल्लाह के रसूल की बात न मानी तो उसका क्या परिणाम हुआ। यदि मान लो कि दुनिया में तुम पर कोई यातना नहीं आई तो कयामत के दिन तुम कुफ्र (इन्कार) के दण्ड से कैसे बच निकलोगे? ये पहले खण्ड की वार्ताएँ हैं।

दूसरे खंड में तहज्जुद की नमाज़ (अनिवार्य नमाज़ों के अतिरिक्त रात में पढ़ी जाने. वाली नमाज़ जो अनिवार्य तो नहीं है किन्तु ईमान वालों के कुछ कम भी नहीं है) के सम्बन्ध में उस आरम्भिक आदेश के सिलसिले में कुछ छूट दे दी गई जो पहले खण्ड के आरम्भ में दिया गया था।

अब यह आदेश दिया गया कि जहाँ तक तहज्जुद की नमाज़ का सम्बन्ध वह तो जितनी आसानी से पढ़ी जा सके, पढ़ लिया करो, किन्तु मुसलमानों को मौलिक रूप से जिस चीज़ का पूर्ण रूप से आयोजन करना चाहिए वह यह है कि पाँच वक्तों की अनिवार्य नमाज़ पूरी पाबन्दी के साथ कायम रखें, ज़कात (दान) देने के अनिवार्य कर्तव्य का ठीक-ठीक पालन करते रहें। और अल्लाह के मार्ग में अपना माल शुद्ध हृदयता के साथ खर्च करें।

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अन्त में मुसलमानों को यह शिक्षा दी गई है कि जो भलाई के काम तुम दुनिया में करोगे, वे विनष्ट नहीं होंगे, बल्कि अल्लाह के यहाँ तुम्हें बड़ा प्रतिदान प्राप्त होगा।

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