सूरह मुमताहिना (60)

सूरह मुमताहिना
“Al-Mumtahanah”

कहाँ नाज़िल हुई:मदीना
आयतें:14 verses
पारा:28

नाम रखने का कारण

इस सूरह की आयत 10 में आदेश दिया गया है कि जो स्त्रियां हिजरत करके जाएं और मुसलमान होने का दावा करें उनकी परीक्षा ली जाए।

इसी सम्पर्क से इसका नाम अल्-मुम्तहिना रखा गया है। इसका उच्चारण मुम्तहना भी किया जाता है और मुस्तहिना भी। पहले उच्चारण के अनुसार अर्थ है “वह स्त्री जिसकी परीक्षा ली जाए। और दूसरे उच्चारण के अनुसार अर्थ है, “परीक्षा लेने वाली सूरह।”

अवतरणकाल

इसमें दो ऐसे मामलों पर वार्तालाप किया गया है जिसका समय ऐतिहासिक रूप से मालूम है। पहला मामला हज़रत हातिब बिन अबी बल्तअह का है और दूसरा मामला उन मुस्लिम स्त्रियों का है जो हुदैबिया की सन्धि के पश्चात् मक्का से हिजरत करके मदीना आने लगी थीं।

इन दो मामलों के उल्लेख से (जिनका विस्तृत वर्णन आगे आ रहा है। यह बात बिल्कुल निशिचत हो जाती है कि यह सूरह हुदैबिया की सन्धि और मक्का की विजय के बीच के समय में अवतरित हुई है।

विषय और वार्ताएँ

इस सूरह के तीन भाग हैं: पहला भाग सूरह के आरम्भ से आयत 10 तक चलता है और सूरह की समाप्ति पर आयत 18 भी इसी से सम्बद्ध है।

इसमें हज़रत हातिब (रजि0) बिन अबी-बल्तअह के इस कर्म पर कड़ी पकड़ की गई है कि उन्होंने केवल अपने परिवार के लोगों को बचाने के ध्येय से अल्लाह के रसूल (सल्ल0) के एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण युद्ध-सम्बन्धी रहस्य से दुश्मनों को अवगत कराने की कोशिश की थी, जिसे यदि ठीक समय पर असफल नहीं कर दिया गया होता तो मक्का की विजय के अवसर पर बड़ा रक्तपात होता।

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और ये समस्त उपलब्धियाँ भी प्राप्त न हो सकतीं जो मक्का पर शान्तिमय विजय प्राप्त करने की स्थिति में प्राप्त हो सकती थीं। (हज़रत हातिब रज़ि० की) इस संगीन गलती को सचेत करते हुए अल्लाह ने समस्त ईमान वालों को यह शिक्षा दी है कि किसी ईमान वाले को किसी दशा में और किसी उद्देश्य के लिए भी इस्लाम के शत्रु के साथ प्रेम और मित्रता का सम्बन्धन रखना चाहिए और कोई ऐसा काम न करना चाहिए जो कुछ और इस्लाम के संघर्ष में काफिरों के लिए लाभकारी हो।

अलबत्ता जो काफिर, इस्लाम और मुसलमानों के विरुद्ध व्यवहारतः शत्रुता और तकलीफ पहुंचाने का बर्ताव न कर रहे उनके साथ सद्व्यवहार की नीति अपनाने में कोई दोष नहीं।

दूसरा भाग आयत 10 और 11 पर आधारित है। इसमें एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक समस्या का फैसला किया गया है जो उस समय बड़ी जटिलता उत्पन्न कर रही थी।

मक्का में बहुत सी मुस्लिम स्त्रियाँ ऐसी थीं जिनके पति काफिर थे और वे किसी न किसी तरह हिजरत करके मदीना पहुंच जाती थीं। इसी तरह मदीना में बहुत से मुस्लिम पुरुष ऐसे थे जिनकी पत्नियाँ काफिर थीं और वे मक्का ही में रह गई थीं।

उनके विषय में ये प्रश्न उठता था कि उनके मध्य दाम्पत्य सम्बन्ध शेष हैं या नहीं। सर्वोच्च ईश्वर ने इसका सदैव के लिए यह निर्णय कर दिया कि मुस्लिम स्त्री के लिए काफिर पति वैध नहीं है और मुस्लिम पुरुष के लिए यह भी वैध नहीं कि वह बहुदेववादी पत्नी के साथ दाम्पत्य सम्बन्ध बनाए रखे।

तीसरा भाग आयत 12 पर आधारित है जिसमें अल्लाह के रसूल (सल्ल0) को आदेश दिया गया है कि जो स्त्रियाँ इस्लाम ग्रहण करें उनसे आप बड़ी-बड़ी बुराइयों से बचने का और भलाई के सभी तरीकों के अनुसरण का वचन लें।

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