सूरह मुदस्सिर (74)

सूरह मुदस्सिर
“Al-Muddaththir”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:56 verses
पारा:29

नाम रखने का कारण

पहली ही आयत के शब्द “अल्-मुद्दस्सिर” (ओढ़-लपेट कर लेटने वाले) को इस सूरह का नाम दिया गया है। यह भी केवल नाम है, विषय-वस्तु की दृष्टि से वार्ताओं का शीर्षक नहीं।

अवतरणकाल

इसकी पहली सात आयतें मक्का मुअज़्ज़मा के बिल्कुल आरम्भिक काल में अवतरित हुई हैं। पहली ‘या’ (प्रकाशना) जो नबी (सल्ल0) पर अवतरित हुई वह “पढ़ो (ऐ नबी), अपने रब के नाम के साथ, जिसने पैदा किया” से लेकर “जिसे वह न जानता था” (सूरह 96 अल-अलक), तक है।

इसके बाद वह्य अवतरित नहीं हुई। इस फ़तरतुल वह्य (वह्य के बन्द रहने के समय) का उल्लेख करते हुए अल्लाह के रसूल (सल्ल0) ने स्वंय कहा है कि “एक दिन मैं रास्ते से गुज़र रहा था। अचानक मैंने आसमान से एक आवाज़ सुनी। सिर उठाया तो वही फरश्तिा जो हिरा की गुफा में मेरे पास आया था, आकाश और धरती के मध्य एक कुर्सी पर बैठा हुआ है।

मैं यह देख कर अत्यन्त भयभीत हो गया और घर पहुंच कर मैंने कहाः “मुझे ओढ़ाओ, मुझे ओढ़ाओ।” अतएव घर वालों ने मुझ पर लिहाफ (या कम्बल ओढ़ा दिया। उस समय अल्लाह ने वह्य अवतरित की, “ऐ ओढ़-लपेट कर लेटने वाले।”

फिर निरन्तर मुझ पर वह्य अवतरित होनी प्रारम्भ हो गई।” (हदीसः बुखारी, मुस्लिम, मुस्नद अहमद, इब्ने जरीर) सूरह का शेष भाग आयत 8 से अन्त तक उस समय अवतरित हुआ जब इस्लाम का खुल्लम-खुल्ला प्रचार शुरू हो जाने के पश्चात् मक्का में पहली बार हज का अवसर आया।

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