सूरह मायदा (5)

सूरह मायदा
“Al-Ma’idah”

कहाँ नाज़िल हुई:मदीना
आयतें:120 verses
पारा:6-7

नाम रखने का कारण

इस सूरह का नाम सूरह की आयत 112 के शब्द माइदा (खाने से भरा दस्तरखान) से उद्धृत है।

अवतरणकाल

सूरह की विषय-वस्तुओं से ज़ाहिर होता है और उल्लेखों से भी इसकी पुष्टि होती है कि यह हुदैबिया की संधि के बाद सन् 6 हिजरी के अंत के समय या सन् 7 हिजरी के आरंभिक समय में अवतरित हुई है। ज़ीक़ादा सन 6 हिजरी की घटना है कि नबी (सल्ल0) ने 1400 मुसलमानों के साथ उमरा अदा करने के लिए मक्का के लिए प्रस्थान किया किन्तु कुरैश के सरदारों ने शत्रुता के आवेग में अरब की प्राचीनतम धार्मिक रीतियों के विपरीत आपको उमरा न करने दिया और बड़े विवाद के पश्चात् यह बात कबूल की कि अगले साल आप दर्शन के लिए आ सकते हैं।

इस अवसर पर ज़रूरत पेश आई कि मुसलमानों को एक तरफ तो काबा के दर्शन के लिए यात्रा के शिष्ट नियम बताए जाएं और  दूसरी तरफ उन्हें ताकीद की जाए कि दुश्मन अधर्मियों ने उनको उमरा से रोक कर जो ज्यादती की है उसके जवाब में वे स्वयं कोई ज्यादती न करें कि ये अवैध होगा।

इसलिए कि बहुत से अधर्मी कबीलों के हज का रास्ता इस्लामी अधिकृत भूभागों से गुजरता था और मुसलमानों के लिए यह संभव था कि जिस तरह उन्हें काबा के दर्शन से रोका गया है उसी तरह वे भी उन्हें रोक दें।

पृष्ठभूमि

सूरह आले इमरान और सूरह निसा के अवतरण से इस सूरह के अवतरण तक पहुंचते-पहुंचते परिस्थितियों में बहुत बड़ा परिवर्तन हो चुका था। या तो वह समय या कि उहुद के युद्ध के आचात ने मुसलमानों के लिए मदीना के निकटवर्ती वातावरण को भी ख़तरनाक बना दिया था या अब यह समय आ गया कि अरब में इस्लाम एक ऐसी शक्ति के रूप में दिखाई देने लगा जिसे पराजित न किया जा सकता हो और इस्लामी राज्य एक तरफ नजद तक, दूसरी तरफ सीरिया की सीमाओं तक, तीसरी तरफ लाल सागर के तट तक और चौथी तरफ भक्का के निकट तक फैल गया। अब इस्लाम मात्र एक धारणा और मत ही न था जिसका शासन केवल दिलों और दिमागों तक सीमित हो, बल्कि वह एक राज्य भी था। जिसका शासन व्यवहारतः उसकी अपनी सीमाओं में रहने वाले सभी लोगों को अपनी परिधि में लिए हुए था।

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(1) मुसलमानों की धार्मिक नागरिकता सम्बन्धी और राजनैतिक जीवन के सम्बन्ध में तद्अधिक आदेश और निर्देश:- इस सिलसिले में हज की यात्रा के प्रतिष्ठित नियम निर्धारित किए गए।

अल्लाह की निशानियों का आदर और काबा के दर्शनार्थियों को न छेड़ने का आदेश दिया गया, खाने-पीने की चीज़ों में हलाल और हराम की निश्चित मर्यादाएं स्थापित की गई और अज्ञान काल के आविष्कृत बन्धनों को तोड़ दिया गया, किताब वालों के साथ खाने-पीने और उनकी स्त्रियों से विवाह करने की अनुमति दी गई, वुजू और स्नान और तयम्मुम के नियम निर्धारित किए गए विद्रोह, फसाद और चोरी की सज़ाएं निश्चित की गई। शराब और जुए को बिल्कुल हराम कर दिया गया, कसम तोड़ने का कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) नियत किया गया।

(2) मुसलमानों को उपदेश:- मुसलमान एक शासक गिरोह बन गए थे इसलिए उन्हें संबोधित करते हुए बार-बार नसीहत की गई कि न्याय पर कायम रहें, अल्लाह का आज्ञापालन और उसके अनुवर्तन का जो वचन उन्होंने दिया है उस पर जमे रहें।

(3) यहूदियों और ईसाइयों को उपदेशः- यहूदियों की शक्ति अब क्षीण हो गई थी। उत्तरी अरब की लगभग तमाम यहूदी बस्तियाँ मुसलमानों के अधीन हो चुकी थीं। इस अवसर पर एक बार उनकी गलत नीति पर सावधान किया गया है और उन्हें सन्मार्ग पर आने का निमंत्रण दिया गया है। इसके साथ ही क्योंकि हुदैबिया की संधि के कारण अरब और उससे लगे हुए दूसरे देश की जातियों में इस्लाम के सन्देश के प्रचार एवं प्रसार का अवसर निकल आया था। इसलिए ईसाइयों को भी सविस् सम्बोधित करके उनकी धारणाओं और आस्थाओं की गलतियां बताई गई हैं और उन्हें अरब के नबी हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) पर ईमान लाने का निमंत्रण दिया गया।

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