सूरह जुम्आ (62)

सूरह जुम्आ
“Al-Jumu’ah”

कहाँ नाज़िल हुई:मदीना
आयतें:11 verses
पारा:28

नाम रखने का कारण

आयत 9 के वाक्यांश “जब पुकारा जाए नमाज़ के लिए जुमुआ (जुमा) के दिन” से उद्धृत है। यद्यपि सूरह में जुमा की नमाज़ के नियम से सम्बंधित भी आदेश दिया गए हैं, किन्तु समग्र रूप से जुमा इसकी वार्ताओं का शीर्षक नहीं है, बल्कि अन्य सूरतों की तरह यह नाम भी चिन्ह ही की तरह है।

अवतरणकाल

आयत 1-8 तक का अवतरणकाल सन् 7 हिजरी है, और सम्भवतः ये ख़ैबर की विजय के अवसर पर या उसके निकटवर्ती समय में अवतरित हुई हैं।

आयत 10 से सूरह के अन्त तक हिजरत के पश्चात् निकटवर्ती समय ही में अवतरित हुई हैं, क्योंकि नबी (सल्ल0) ने मदीना तैयबा पहुंचते ही पांचवे दिन जुमा कायम कर दिया था और सूरह की अन्तिम आयत में जिस घटना की ओर संकेत किया गया है साफ बता रहा है कि वह जुमा की स्थापना का क्रम आरम्भ होने के पश्चात् अनिवार्यतः किसी ऐसे ही समय में घटित हुई होगी जब लोगों को धार्मिक सम्मेलनों के शिष्टाचार का पूर्ण प्रशिक्षण अभी प्राप्त नहीं हुआ था।

विषय और वार्ताएँ

जैसा कि हम ऊपर बयान कर चुके हैं, इस सूरह के दो भाग अलग-अलग समयों में अवतरित हुए हैं। इसलिए दोनों के विषय अलग हैं और जिनसे सम्बोधन है वे भी अलग हैं।

पहला भाग उस समय अवतरित हुआ जब यहूदियों के समस्त प्रयास असफल हो चुके थे जो इस्लाम के आह्वान का रास्ता रोकने के लिए विगत वर्षों के अन्तराल में उन्होंने किए थे।

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इन आयतों के अवतरण के समय (उनका सबसे बड़ा गढ़ ख़ैबर) भी बिना किसी असाधारण अवरोध के विजित हो गया। इस अन्तिम पराजय के पश्चात् अरब में यहूदी शक्ति बिल्कुल समाप्त हो गई।

वादि-उल-कुरआ, फदक, तैमा तबूक सब एक-एक करके हथियार डालते चले गए, यहाँ तक कि अरब के सभी यहूदी इस्लामी राज्य की प्रजा बन कर रह गए।

यह अवसर था जब अल्लाह ने इस सूरह में एक बार फिर उनको सम्बोधित किया और सम्भवतः यह अन्तिम सम्बोधन था जो कुरआन मजीद में उनसे किया गया। इसमें उन्हें सम्बोधित करके तीन बातें कही गई हैं:

(1) तुम ने इस रसूल को इसलिए मानने से इन्कार कर दिया कि यह उस जाति में भेजा गया था जिसे तुम हेयता के साथ “उम्मी” कहते हो।

तुम्हारा असत्य प्रमादपूर्ण दावा यह था कि रसूल अनिर्वायतः तुम्हारी अपनी जाति ही का होना चाहिए और (यह कि) “उम्मियों” में कभी कोई रसूल नहीं आ सकता।

लेकिन अल्लाह ने उन्हीं “उम्मियों” में से एक रसूल उठाया है, जो ‘तुम्हारी आँखों के सामने उसकी किताब सुना रहा है, आत्माओं को विकसित कर रहा है, और उन लोगों को सत्य मार्ग दिखा रहा है जिनकी पथभ्रष्टता का हाल तुम स्वयं भी जानते हो। यह अल्लाह की उदार कृपा है, जिसे चाहे उसे सम्पन्न करे।

(2) तुम को तौरात का वाहक बनाया था, किन्तु तुम ने उसके उत्तरदायित्व को न समझा, न निबाहा (यहाँ तक कि) तुम जानते-बूझते अल्लाह की आयतों को झुठलाने से भी बाज़ नहीं रहते। इस पर भी तुम्हारा दावा यह है कि तुम अल्लाह के प्रिय हो और ईशदूतत्व (पैग़म्बरी) का वरदान सदैव लिए तुम्हारे नाम लिख दिया गया है।

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(3) तुम यदि वास्तव में अल्लाह के प्रिय होते और तुम्हें यदि विश्वास होता कि उसके यहाँ बड़े आदर और सम्मान एवं प्रतिष्ठा का स्थान सुरक्षित है, तो तुम्हें मृत्यु का ऐसा भय न होता कि अपमानजनक जीवन स्वीकार है, किन्तु मृत्यु किसी तरह स्वीकार नहीं।

तुम्हारी यह हालत स्वयं इस बात का प्रमाण कि अपनी करतूतों से तुम स्वयं परिचित हो और तुम्हारी अन्तरात्मा भली-भाँति जानती है कि इन करतूतों के साथ मरोगे तो अल्लाह के यहाँ इससे अधिक अपमानित होगे, जितने दुनिया में हो रहे हो।

दूसरा भाग इस सूरह में लाकर इसलिए शामिल किया गया है कि अल्लाह ने यहूदियों के ‘सब्त’ के मुकाबले में मुसलमानों को जुमा प्रदान किया है, और अल्लाह मुसलमानों को सावधान करना चाहता है कि वे अपने जुमा के साथ वह मामला न करें जो यहूदियों ने ‘सब्त’ के साथ किया था।

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