सूरह जिन्न (72)

सूरह जिन्न
“Al-Jinn”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:28 verses
पारा:29

नाम रखने का कारण

“अल्-जिन्न” सूरह का नाम भी है और विषय-वस्तु की दृष्टि से इसका भी, क्योंकि इसमें जिन्न के कुरआन सुन कर जाने और अपनी जाति में इस्लाम के प्रचार करने की घटना का सविस्तार वर्णन किया गया है।

विषय और वार्ताएँ

इस सूरह में पहली आयत से लेकर आयत 15 तक यह बताया गया है कि जिन्न के गिरोह पर कुरआन मजीद सुन कर क्या प्रभाव पड़ा और फिर वापस जा कर अपनी जाति के दूसरे जिन्नों से क्या-क्या बातें कहीं।

इस सिलसिले में अल्लाह ने उनकी समग्र बात-चीत उद्धृत नहीं की है, बल्कि केवल उन विशेष बातों को उद्धृत किया है जो उल्लेखनीय थीं।

तदान्तर आयत 16 से 17 तक लोगों को हितोपदेश दिया गया है कि वे बहुदेववाद को त्याग दें और सीधे मार्ग पर दृढ़ता के साथ चलें तो उन पर प्रसादों की वर्षा होगी अन्यथा अल्लाह की भेजी हुई नसीहत से मुंह मोड़ने का परिणाम यह होगा कि उन्हें कठोर यातना का सामना करना पड़ेगा।

फिर आयत 19 से 29 तक मक्का के काफिरों की इस बात पर निन्दा की गई है कि जब अल्लाह का रसूल अल्लाह की ओर आमंत्रित करने के लिए आवाज़ बुलन्द करता है तो वे उस पर टूट पड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं।

फिर आयत 24 से 25 में काफिरों को चेतावनी दी गई है कि आज वे रसूल को असहाय देख कर उसे दबा लेने की चेष्टा कर रहे हैं, किन्तु एक समय आएगा जब उन्हें मालूम हो जाएगा कि वास्तव में असहाय कौन अन्त में लोगों को बताया गया है कि परोक्ष का ज्ञाता केवल अल्लाह है। रसूल (सल्ल0) को केवल वह ज्ञान प्राप्त होता है जो अल्लाह उन्हें देना चाहता है।

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