सूरह हज (22)

सूरह हज
“Al-Hajj

कहाँ नाज़िल हुई: मदीना
आयतें:78 verses
पारा:17

नाम रखने का कारण

इस सूरह का नाम सूरह की आयत 27 “और लोगों को हज के लिए सामान्य रूप से अनुमति दो” से उद्धृत है।

अवतरणकाल

इस सूरह में मक्की और मदनी सूरतों की विशेषताएँ मिली-जुली पाई जाती हैं। इसी कारण टीकाकारों में इस सम्बन्ध में मतभेद हुआ है कि यह मक्की है या मदनी।

लेकिन हमारी दृष्टि में इसकी विषय-वस्तु और वर्णन-शैली का यह रंग इस कारण है कि इसका एक भाग मक्कीकाल के अंत में और दूसरा भाग मदनीकाल के आरम्भ में अवतरित हुआ है। इसलिए दोनों कालों की विशेषताएँ इसमें एकत्र हो गई हैं।

प्रारम्भिक भाग के विषय और वर्णन-शैली से साफ पता चलता है कि यह मक्का में अवतरित हुआ है और अधिक सम्भावना इसकी है कि मक्की जीवन के अन्तिम चरण में हिजरत के कुछ पहले अवतरित हुआ है। यह भाग आयत 24 पर समाप्त होता है।

इसके पश्चात “जिन लोगों ने कुफ्र (इन्कार) किया और जो (आज) अल्लाह के मार्ग से रोक रहे हैं” से सहसा विषय का रंग बदल जाता है और साफ़ महसूस होता है कि यहाँ से अन्त तक का भाग मदीना तय्यबा में अवतरित हुआ है।

असम्भव नहीं कि यह हिजरत के पश्चात् पहले ही वर्ष जिलहिज्जा में अवतरित हुआ हो, क्योंकि आयत 25 से 41 तक का विषय इसी बात का पता देता है, और आयत 39-40 के अवतरण के सम्बद्ध उल्लेख से भी इसका समर्थन होता है।

उस समय मुहाजिर (मक्का त्यागनेवाले मुसलमान) अभी ताज़ा ताज़ा ही अपने घर-बार छोड़कर मदीना में आए थे। हज के समय में उनको अपना नगर और हज का सम्मेलन याद आ रहा होगा और यह बात बुरी तरह खल रही होगी कि कुरैश के बहुदेववादियों ने उनपर मस्जिदे हराम (काबा) का रास्ता तक बन्द कर दिया है।

ये भी पढ़े -   सूरह जुम्आ (62)

उस समय वे इस बात की प्रतीक्षा में होंगे कि जिन जालिमों ने उनको घर से निकाला, मस्जिदे-हराम के दर्शन से वंचित किया और अल्लाह का मार्ग ग्रहण करने पर उनके जीवन तक को दुष्कर कर दिया, उनके विरुद्ध युद्ध करने की अनुमति मिल जाए।

यह ठीक मनोवांछित अवसर था इन आयतों के अवतरण का। इसमें पहले तो हज का उल्लेख करते हुए यह बताया गया है कि यह मस्जिदे-हराम इसलिए बनाई गई थी और यह हज का तरीका इसलिए शुरू किया गया था कि संसार में एक ख़ुदा की बंदगी की जाए, किन्तु आज वहां बहुदेववादी प्रथा प्रचलित है और एक ख़ुदा की बन्दगी करनेवालों के लिए उसके मार्ग बन्द कर दिये गए हैं।

इसके बाद मुसलमानों को अनुज्ञा दे दी गई है कि वे उन ज़ालिमों के विरुद्ध युद्ध करें और उन्हें बहिष्कृत करके देश में वह ठीक व्यवस्था स्थापित करें, जिसमें बुराइयां दबे और नेकियाँ विकसित हों।

Leave a Reply