सूरह हदीद (57)

सूरह हदीद
“Al-Hadeed”

कहाँ नाज़िल हुई: मदीना
आयतें:29 verses
पारा:27

नाम रखने का कारण

आयत 25 के वाक्यांश, “और लोहा (अल-हदीद) उतारा” से उद्धृत है।

अवतरणकाल

इसके मदनी सूरह होने में सब एक मत हैं और इसकी वार्ताओं पर विचार करने से आभासित होता है कि सम्भवतः यह उहुद के युद्ध और हुदैबिया की सन्धि के मध्य किसी समय अवतरित हुई है।

यह वह समय था जब इस्लाम को अपने अनुयायियों से केवल प्राण की कुरबानी ही की ज़रूरत न थी बल्कि धन की कुरबानी की भी ज़रूरत थी, और इस सूरह में इसी कुरबानी के लिए ज़ोरदार अपील की गई है। इस अनुमान की आयत 10 से तदधिक पुष्टि होती है।

विषय और वार्ता

इसका विषय अल्लाह के मार्ग में खर्च करने पर उभारना है। यह सूरह इस उद्देश्य के लिए अवतरित की गई थी कि मुसलमानों को विशेष रूप से धन की कुर्बानियों के लिए तैयार किया जाए और यह बात उनके मन में बिठाई जाए कि ईमान (की मूल अत्मा और वास्तविकता) अल्लाह और उसके धर्म के लिए विशुद्ध हृदय होना है।

जो व्यक्ति इस आत्मा से वंचित है और ईश्वर और उसके धर्म के मुकाबले में अपने प्राण, धन और अपने हित को अधिक प्रिय समझे, उसके ईमान की स्वीकृति खोखली है।

इस उद्देश्य के लिए सबसे पहले अल्लाह के गुण वर्णित किए गए हैं ताकि सुननेवालों को भली प्रकार यह एहसास हो जाए कि किस महान सत्ता की ओर से उनको सम्बोधित किया जा रहा है। इसके पश्चात् ये निम्नलिखित वार्ताएँ क्रमशः प्रस्तुत की गई हैं।

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(1) ईमान को अनिवार्यतः यह अपेक्षित है कि आदमी ईश्वर के मार्ग में माल खर्च करने से पहलू न बचाए।

(2) ईश्वर के मार्ग में प्राण और धन की कुर्बानी देना यद्यपि हर हाल में अपना मूल्य रखता है, किन्तु इन कुरबानियों का मूल्य अवसर की गम्भीरता की दृष्टि से निश्चित होता है।

जो लोग इस्लाम की कमजोरी की स्थिति में उसे उच्च करने के लिए जाने लड़ाएँ और माल ख़र्च करें उनके दर्जे को वे लोग नहीं पहुँच सकते जो इस्लाम को प्रभुत्वशाली होने की स्थिति में उसको तदाधिक उन्नति के लिए जान और माल कुरबान करें।

(3) सत्यमार्ग में जो माल भी ख़र्च किया जाए वह अल्लाह के ज़िम्मे ऋण है, अल्लाह उसे न केवल यह कि कई गुना बढ़ा-चढ़ाकर लौटाएगा बल्कि अपनी ओर से और अधिक प्रतिदान भी प्रदान करेगा।

(4) परलोक में प्रकाश उन्हीं ईमान वालों के हिस्से में आएगा जिन्होंने ईश्वरीय मार्ग में अपना माल खर्च किया हो रहे वे कपटाचारी जो संसार में अपने ही हित को देखते रहे, परलोक में उनको ईमान वालों से विलग कर दिया जाएगा, वे प्रकाश से वंचित होंगे और उनका परिणाम वही होगा जो काफिरों का होगा।

(5) मुसलमानों को उन किताब वालों की तरह नहीं हो जाना चाहिए जिनके हृदय दीर्घकाल की बेसुधियों के कारण पत्थर हो गए। वह ईमानवाला ही क्या जिसका हृदय ईश्वर के स्मरण से न पिघले और उसके अवतरित किए हुए सत्य के आगे न झुके।

(6) अल्लाह की दृष्टि में सत्यवान (सिद्दीक) और शहीद केवल वे ईमान वाले हैं जो अपना धन किसी दिखावे की भावना के बिना सच्चे दिल से उसकी राह में ख़र्च करते हैं।

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(7) संसारिक जीवन केवल थोड़े दिनों की बहार और एक धोखे की सामग्री है। यहाँ की साज-सज्जा और यहाँ का धन-दौलत, जिसमें लोग एक दूसरे से बढ़ जाने की कोशिश करते हैं, सब कुछ अस्थायी है। स्थायी जीवन वास्तव में पारलौकिक जीवन है। तुम्हें एक-दूसरे से आगे निकलने का प्रयास करना है तो यह प्रयास जन्नत की ओर दौड़ने में करो।

(8) संसार में सुख तथा दुख जो भी होता है अल्लाह के पहले से लिखे हुए फैसले अनुसार होता है। ईमान वालों का चरित्र यह होना चाहिए कि दुख या कष्ट आए तो साहस न छोड़ बैठें, और सुख आए तो इतराने न लगें।

(9) अल्लाह ने अपने रसूल खुली खुली निशानियों और न्याय तुला के साथ भेजे, ताकि लोग न्याय पर स्थिर रह सकें, और इसके साथ लोहा भी उतारा ताकि सत्य को स्थापित करने और असत्य का सिर नीचा करने के लिए शक्ति का प्रयोग किया जाए।

इस तरह अल्लाह यह देखना चाहता है कि मनुष्यों में से कौन लोग ऐसे निकलते हैं जो उसके धर्म के समर्थन और उसकी सहायता के लिए खड़े हों और उसके लिए जान लड़ा दें।

(10) अल्लाह की ओर से पहले पैग़म्बर आते रहे जिनके आमंत्रण से कुछ लोगों ने सीधा रास्ता अपनाया, किन्तु अधिकतर अवज्ञाकारी बने रहे। फिर ईसा (अलै.) आए जिनकी शिक्षा से लोगों में बहुत-से नैतिक गुण पैदा हुए किन्तु उनके समुदाय ने सन्यास की नई रीती अपनाई।

अब सर्वोच्च अल्लाह ने मुहम्मद (सल्ल.) को भेजा है। उन पर जो लोग ईमान लाएँगे, अल्लाह उनको अपनी दयालुता का दोहरा हिस्सा देगा और उन्हें (सीधी राह दिखाने वाला) प्रकाश प्रदान करेगा।

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किताब वाले चाहे अपने आपको अल्लाह के उदार-दान का ठेकेदार समझते रहें, किन्तु अल्लाह का उदार-दान उसके अपने ही हाथ में है, उसे अधिकार है जिसे चाहे अपने उदार-दान से सम्पन्न करे।

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