सूरह हाक्का (69)

सूरह हाक्का
“Al-Haaqqa”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:52 verses
पारा:29

नाम रखने का कारण

सूरह के पहले शब्द “अल-हाक्का” (हो कर रहने वाली) को इस सूरह का नाम दे दिया गया है।

अवतरणकाल

इस सूरह की वार्ताओं से मालूम होता है कि यह मक्का के आरम्भिक काल में उस समय अवतरित हुई थी जब अल्लाह के रसूल (सल्ल0) के प्रति विरोध ने अभी अधिक उग्र रूप धारण नहीं किया था।

विषय और वार्ता

आयत 1 से 36 तक परलोक का उल्लेख है और आगे सूरह के अन्त तक कुरआन के अल्लाह की ओर से अवतरित होने और मुहम्मद (सल्ल0) के सच्चे रसूल होने का उल्लेख किया गया है।

सूरह के पहले भाग का प्रारम्भ इस बात से हुआ है कि कयामत का आना और आख़िरत (परलोक) का घटित होना एक ऐसा तथ्य है जो अवश्य ही सामने आकर रहेगा।

फिर आयत 4 से 12 तक यह बताया गया है कि पूर्व समय में जिन जातियों में भी परलोक का इन्कार किया है, वे अन्ततः ईश्वरीय यातना की भागी कर रहीं।

तदान्तर आयत 17 तक प्रलय (कयामत ) का चित्रण किया गया है कि वह किस प्रकार घटित होगी। फिर आयत 18 से 27 तक यह बताया गया है कि उस दिन समस्त मनुष्य अपने प्रभु के न्यायालय में उपस्थित होंगे, जहाँ उनका कोई भेद छिपा न रह जाएगा।

हरेक का कर्मपत्र उसके हाथ में दे दिया जाएगा। (सुकर्मी) अपना हिसाब दोषरहित देख कर प्रसन्न हो जाएंगे और उनके हिस्से में जन्नत (स्वर्ग) का शाश्वत सुख एवं आनन्द आएगा।

इसके विपरीत जिन लोगों ने न ईश्वर के अधिकार को माना और न उसके बन्दों का हक़ अदा किया, उन्हें ईश्वर की पकड़ से बचाने वाला कोई न होगा और वे जहन्नुम (नरक) की यातना में ग्रस्त हो जाएंगे, सूरह के दूसरे भाग (आयत 38 से सूरह के अन्त तक) में मक्का के काफिरों को सम्बोधित करते हुए कहा गया है कि तुम इस कुरआन को कवि और काहिन (भविष्यवक्ता) की वाणी कहते हो, हालांकि यह अल्लाह की अवतरित की हुई वाणी है, जो एक प्रतिष्ठित सन्देशवाहक के मुख से उच्चारित हो रही है।

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रसूल (संदेशवाहक) को इस वाणी में अपनी ओर से एक भी शब्द घटाने या बढ़ाने का अधिकार नहीं। यदि वह इसमें मनगढन्त कोई चीज़ सम्मिलित कर दे तो हम उसकी गर्दन की रग (या हृदयनाड़ी) काट दें।

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