सूरह बुरूज (85)

सूरह बुरूज
“Al-Burooj”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:22 verses
पारा:30

नाम रखने का कारण

पहली ही आयत के शब्द “अल-बुरुज” (मज़बूत किलो) को इसका नाम दिया गया है।

अवतरणकाल

इसकी वार्ता स्वयं यह बता रही है कि यह सूरह मक्का मुअज्ज़मा के उस काल खण्ड में अवतरित हुई है जब अत्याचार और अनाचार प्रचण्ड रूप धारण कर चुका था और मक्का के काफिर मुसलमानों को कड़ी यातना देकर ईमान से फेर देने की कोशिश कर रहे थे।

विषय और वार्ता

इसका विषय काफिरों को अत्याचार के बुरे परिणाम से सावधान करना है, जो दे ईमान वालों के साथ कर रहे थे और ईमान वालों को यह सांत्वना देना है कि यदि वे इन अत्याचारों के मुकाबले में जमे रहेंगे तो उनको इसका उत्तम प्रतिदान प्राप्त होगा और सर्वोच्च अल्लाह अत्याचारियों से बदला लेगा।

इस सिलसिले में सबसे पहले असहाबुल-उख़दूद (गड़हे वालों) का किस्सा सुनाया गया है, जिन्होंने ईमान लाने वालों को आग से भरे हुए गढ़े में फेंक कर जला दिया था।

इस किस्से के रूप में कुछ बातें ईमान वालों और काफिरों के मन में बिठाई गई हैं। एक, यह कि जिस तरह असहाबुल-उख़दूद (गड़हे वाले) ईश्वर की फटकार और उसकी मार के भागी हुए, उसी तरह मक्का के सरदार भी उसके भागी बन रहे हैं।

दूसरे, यह कि जिस तरह ईमान वालों ने उस समय आग के गड्ढो में गिरकर प्राण दे देना स्वीकार कर लिया था और ईमान से फिरना स्वीकार नहीं किया था, उसी तरह अब भी ईमान वालों को चाहिए कि प्रत्येक कठिन से कठिन यातना भुगत लें, किन्तु ईमान की राह से न हटें।

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तीसरे, यह कि जिस ईश्वर को मानने पर काफि क्रुद्ध होते और ईमान वाले आग्रह करते हैं, वह ईश्वर सब पर प्रभावी है, अपने आप में स्वयं प्रशंसा का अधिकारी है और वह दोनों गिरोहों की दशा को देख रहा है।

इसलिए यह बात निश्चित है कि (इसमें से हरेक अपने किए का बदला पा कर रहे) फिर काफिरों को सावधान किया गया है कि ईश्वर की पकड़ बड़ी कड़ी है।

अगर तुम अपने साथ जत्थे की शक्ति के दम्भ में पड़े हो, तो तुम से बड़े जत्थे फिरऔन और समूद के पास थे, उनकी सेनाओं का जो परिणाम हुआ है उससे शिक्षा ग्रहण करो।

ईश्वर शक्ति तुम्हें इस तरह अपने घेरे में लिए हुए है कि उससे तुम निकल नहीं सकते और कुरआन, जिसके झुठलाने पर तुम तुले हुए हो, उसकी हर बात अटल है, यह उस सुरक्षित पट्टिका (लोहे-महसूज़) में अंकित है, जिसका लिखा किसी के बदलने से नहीं बदल सकता।

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