सूरह बलद (90)

सूरह बलद
“Al-Balad”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का मदीना
आयतें:20 verses
पारा:30

नाम रखने का कारण

पहली ही आयत “नहीं, मैं कसम खाता हूँ अल्-बलद (इस शहर मक्का) की” के शब्द ‘अल्-बलद’ को इसका नाम दिया गया है।

अतवरणकाल

इसका विषय और वर्णन शैली मक्का मुअज्ज़मा के आरम्भिक काल की सूरतों जैसी है, किन्तु एक संकेत इसमें ऐसा मौजूद है जो पता देता है कि इसके अवतरण का समय वह था जब मक्का के काफिर अल्लाह के रसूल (सल्ल0) की दुश्मनी पर तुल गए थे और आपके विरुद्ध हर अनाचार और अत्याचार को उन्होंने अपने लिए वैध कर लिया था।

विषय और वार्ता

इस सूरह का विषय संसार में मनुष्य की और मनुष्य के लिए संसार की वास्तविक हैसियत समझाना और यह बताना है कि ईश्वर ने मनुष्य के लिए सौभाग्य और दुर्भाग्य के दोनों रास्ते खोल कर रख दिए हैं।

उनको देखने और उन पर चलने के संसाधन भी उसके लिए जुटा दिए हैं। और अब यह मनुष्य के अपने प्रयास और परिश्रम पर निर्भर करता है कि वह सौभाग्य के मार्ग पर चल कर अच्छे परिणाम को पहुंचता है या दुर्भाग्य का मार्ग ग्रहण कर के बुरे परिणाम का सामना करता है।

सबसे पहले मक्का नगर और उसमें अल्लाह के रसूल (सल्ल0) पर बीतने वाली मुसीबतें और आदम की पूरी संतान की हालत को इस तथ्य पर साक्षी के रूप में प्रस्तुत किया गरग है कि, यह संसार मनुष्य के लिए विश्राम स्थान नहीं है, बल्कि यहाँ वह पैदा ही मशक्कत (परिश्रम) की हालत में हुआ है।

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इस विषय को यदि सूरह 58 (नज्म) की आयत 39 “मनुष्य के लिए कुछ नहीं, लेकिन वह जिसके लिए उसने प्रयास किया है” से मिला कर देखा जाए तो बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है कि इस कर्म भूमि संसार में मनुष्य का भविष्य उसकी चेष्टा, प्रयास और मेहनत मशक्कत पर निर्भर करता है।

इसके बाद मनुष्य की यह भ्रान्ति दूर की गई है कि उस पर कोई सर्वोच्च सत्ता नहीं है जो उसके कार्य को देख रही है और उस पर उसकी पकड़ करने वाली है। फिर बताया गया है कि दुनिया में मनुष्य ने बड़ाई और श्रेष्ठता के कैसे ग़लत मानदण्ड निश्चित कर रखे हैं।

जो व्यक्ति अपनी बड़ाई के प्रदर्शन के लिए ढेरों माल लुटाता है, लोग उसकी अधिक प्रशंसा करते हैं, हालांकि जो सत्ता उसके कार्य की देख-रेख कर रही है, वह देखती है कि उसने यह माल किन तरीकों से प्राप्त किया और किन रास्तों में, किस नीयत और किन उद्देश्यों के लिए खर्च किया।

इसके बाद सर्वोच्च अल्लाह कहता है कि हम ने मनुष्य को ज्ञान के साधन और सोचने-समझने की क्षमताएं देकर उसके सामने भलाई और बुराई के दोनों रास्ते खोल कर रख दिए हैं।

एक रास्ता वह है जो नैतिक पतनों की ओर जाता है और उस पर जाने के लिए कोई कष्ट नहीं उठाना पड़ता, बल्कि मन को खूब रस मिलता है।

दूसरा रास्ता नैतिक ऊर्ध्वताओं की ओर जाता है कि उस पर चलने के लिए आदमी को अपनी इंद्रियों को बाध्य करना पड़ता है। फिर अल्लाह ने बताया है कि वह घाटी क्या है जिससे गुज़र कर आदमी ऊँचाइयों की ओर जा सकता हैं इस मार्ग पर चलने वालों का परिणाम यह है कि मनुष्य अल्लाह की दयालुताओं का पात्र हो जाए, और इसके विपरीत दूसरा मार्ग ग्रहण करने वालों का परिणाम नरक की आग है, जिससे निकलने के सारे द्वार बन्द हैं।

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