सूरह अन्कबूत (29)

सूरह अन्कबूत
“Al-Ankabut”

कहाँ नाज़िल हुई:मक्का
आयतें:69 verses
पारा:20-21

नाम रखने का कारण

आयत 41 के वाक्यांश “जिन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर दूसरे संरक्षक बना लिए हैं उनकी मिसाल मकड़ी (अन्कबूत) जैसी है” से उद्धृत है। मतलब यह है कि यह वह सूरह है जिसमें अन्कबूत शब्द आया है।

अवतरणकाल

आयत 56 से लेकर 60 तक से स्पष्टतः ऐसा लगता है कि यह सूरह हबशा की हिजरत से कुछ पहले अवतरित हुई थी। शेष वार्ताओं के आंतरिक साक्ष्य में भी इसी की पुष्टि होती है, क्योंकि पृष्ठभूमि में उसी कालखण्ड की परिस्थितियाँ झलकती दिखाई देती हैं।

विषय और वार्ता

सूरह को पढ़ते हुए महसूस होता है कि इसके अवतरण के समय मक्का में मुसलमानों पर बड़ी मुसीबतें और कष्टों का समय था (उस समय) अल्लाह ने यह सूरह एक तरफ सच्चे ईमान वाले लोगों में संकल्प एवं साहस और जमाव पैदा करने के लिए, और दूसरी तरफ कमज़ोर ईमान वाले लोगों को शर्म दिलाने के लिए अवतरित की।

इसके साथ मक्का के काफिरों को भी इसमें (सत्य के बैर के परिणाम के विषय में) बड़ी ताड़ना दी गई है। इस सम्बन्ध में उन प्रश्नों का उत्तर भी दिया गया है जो कुछ मुस्लिम नव युवकों के सामने उभर कर आ रहे थे।

उदाहरणार्थ, उनके माता-पिता उन पर ज़ोर डालते थे कि हमारे धर्म पर अडिग रहो। जिस कुरआन पर तुम ईमान लाए हो उसमें भी तो यही लिखा है कि माँ बाप का हक़ सबसे ज्यादा है।

तो हम जो कुछ कहते हैं उसे मानो अन्यथा तुम स्वयं अपने ही धर्म के विपरीत काम करोगे। इनका उत्तर आयत 8 में दिया गया है। इसी प्रकार कुछ नव मुस्लिमों से उनके क़बीले के लोग कहते थे कि अज़ाब-सवाब (पाप-पुण्य) हमारी गर्दन पर, हमारा कहना मानो और इस व्यक्ति से अलग हो जाओ। (अल्लाह के यहाँ इसके उत्तरदायी हम हैं।)

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इसका उत्तर आयत 12, 13 में दिया गया है। जो किस्से इस सूरह में बयान किए गए हैं, उनमें भी अधिकतर वही पहलू उभरा हुआ है कि पिछले नबियों को देखो, कैसी-कैसी कठिनाइयाँ उन पर आई और कितने-कितने दीर्घकाल तक वे सताए गए, फिर अन्ततोगत्वा अल्लाह की ओर से उनकी सहायता हुई।

इसलिए घबराओ नहीं। अल्लाह की मदद ज़रूर आएगी, किन्तु परीक्षा की एक अवधि गुज़रनी ज़रूरी है। फिर मुसलमानों को आदेश दिया गया है कि यदि अत्याचार तुम्हारे लिए असहनीय हो जाएँ तो ईमान छोड़ने के बदले घर-बार छोड़कर निकल जाओ।

ईश्वर की धरती विशाल है। जहाँ अल्लाह की बन्दगी कर सको वहाँ चले जाओ। इन सब बातों के साथ काफिरों को समझाने-बुझाने का पहलू भी छूटने नहीं पाया है।

बल्कि एकेश्वरवाद और परलोकवाद दोनों वास्तविकताओं को प्रमाणों के साथ उनके मन में बिठाने की कोशिश की गई है।

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